12/14/2013

Munawwar Rana - Ghar me rahte hue gairon ki tarha hoti hain (मुनव्वर राना - घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं)


 मुनव्वर राणा
Munawwar Rana 

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घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं

घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं 
बेटियाँ धान के पौधों की तरह होती हैं

उड़के एक रोज़ बड़ी दूर चली जाती हैं
घर की शाख़ों पे ये चिड़ियों की तरह होती हैं

सहमी-सहमी हुई रहती हैं मकाने दिल में
आरज़ूएँ भी ग़रीबों की तरह होती हैं 

टूटकर ये भी बिखर जाती हैं एक लम्हे में
कुछ उम्मीदें भी घरौंदों की तरह होती हैं

आपको देखकर जिस वक़्त पलटती है नज़र 
मेरी आँखें , मेरी आँखों की तरह होती हैं 

बाप का रुत्बा भी कुछ कम नहीं होता लेकिन
जितनी माँएँ हैं फ़रिश्तों की तरह होती हैं

मुनव्वर राना 

मुनव्वर राना कि ग़ज़लों और शायरियों का संग्रह 

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Ghar me rahte hue gairon ki tarha hoti hain

Ghar me rahte hue gairon ki tarha hoti hain
Betiyan dhaan ke poudho ki tarha hoti hain 

Ud ke ek roz bahot door chali jaati hain
Ghar ki shakhon pe yah chidyon ki tarha hoti hain

Sehmi sehmi hue rahti hain maakan dil me
Aarzooyein bhi gareebo ki tarha hoti hain

Tootkar ye bhi bikhar jaati hain aek lamhe me 
Kuch ummiden bhi ghroundon ki tarah hoti hain

Aapko dekhkar jis waqt palatati hain nazar
Meri aankhe, meri aankhon ki tarah hoti hain

Baap ka rutabaa bhi kuch kam nahi hota
Jitni maayen hain fariston ki tarah hoti hain 


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1 comment:

  1. छोड़ अपने नैहर को नदपत से जा मिलती हैं..,
    बहती नदियाँ पहाड़ों के आँसू की तरह होती हैं.....

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