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शूर्पणखा-रावण संवाद : जानिए क्यों नष्ट हो जाते है संन्यासी, पराक्रमी राजा तथा गुणवान मनुष्य?

Posted on May 11, 2016May 11, 2016 by Pankaj Goyal

Surpanakha Ravan Samvad : श्रीरामचरितमानस के अरण्य कांड में जब शूर्पणखा लक्ष्मण द्वारा नाक, कान काटे जाने के बाद रावण के पास जाती है, तब वह रावण को बताती है कि कौन से अवगुण संन्यासी, पराक्रमी राजा तथा गुणवान मनुष्य को भी नष्ट कर सकते हैं। आज हम आपको उन्हीं अवगुणों के बारे में बता रहे हैं-

Surpanakha Ravan Samvad

चौपाई-
संग तें जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा।।
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहिं बेगि नीति अस सुनी।।

अर्थात्- शूर्पणखा रावण से कहती है कि विषयों के संग से संन्यासी, बुरी सलाह से राजा, मान से ज्ञान, मदिरापान से लज्जा, नम्रता के बिना (नम्रता न होने से) प्रीति और मद (अहंकार) से गुणवान शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार की नीति मैंने सुनी है।

विषयों से दूर रहें संन्यासी
हिंदू धर्म में साधु-संन्यासी को पूजनीय बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि संन्यासी ईश्वर के निकट होते हैं, लेकिन यदि कोई संन्यासी होने के बाद भी कोई विषयों (वासना, लोभ आदि) में घिरा रहता है तो उसका शीघ्र ही पतन हो जाता है। इसलिए संन्यासी को विषयों से अलग रहना चाहिए।

राजा को नहीं माननी चाहिए गलत सलाह
राजा भले ही कितना भी पराक्रमी क्यों न हो, लेकिन यदि वह बार-बार अपने मंत्री व मित्रों की गलत सलाह मानता रहेगा तो उसे भी नष्ट होने में अधिक समय नहीं लगता। धर्म ग्रंथों के अनुसार राजा का प्रथम कर्तव्य अपनी प्रजा का पालन-पोषण करना है।
गलत सलाह के कारण यदि वह अपने कर्तव्य पूरे नहीं कर पाएगा तो नागरिक उसके विरुद्ध बगावत कर सकते हैं। इस स्थिति का फायदा अन्य राजा भी उठा सकते हैं। इसलिए राजा को अपने मंत्रियों से सलाह अवश्य लेना चाहिए, लेकिन बिना सोचे-विचारे उस सलाह पर अमल नहीं करना चाहिए।

ज्ञान का घमंड कभी न करें
जीवन में ज्ञान का बहुत महत्व है। अगर आपके पास ज्ञान है तो आप अपने जीवन में हर वो चीज हासिल कर सकते हैं, जो आपको चाहिए। कहते हैं ज्ञान बांटने से और बढ़ता है। इसलिए ज्ञानी व्यक्ति को सदैव अपना ज्ञान बांटने के लिए तैयार रहना चाहिए। लेकिन कुछ लोगों को अपने ज्ञान पर घमंड हो जाता है और वे दूसरों के साथ अपना ज्ञान बांटने से कतराते हैं।
ऐसे लोग हमेशा कुंठित ही रहते हैं। उन्हें हमेशा यही डर सताता है कि कहीं कोई उनसे उनका ज्ञान छिन न ले। ऐसे में उनका ज्ञान संकुचित रह जाता है और वह ज्ञान उनके भी किसी काम का नहीं रहता। इसलिए ज्ञान पर कभी घमंड नहीं करना चाहिए और सदैव ज्ञान बांटने के लिए तत्पर रहना चाहिए।

मदिरापान से नष्ट हो जाती है लज्जा
लज्जा यानी मर्यादा। हमारे धर्म ग्रंथों में हर व्यक्ति के लिए मर्यादा तय की गई है। जब कोई व्यक्ति मर्यादा में नहीं रहता तो उसे अपयश का सामना करना पड़ता है। मदिरापान यानी शराब पीने से व्यक्ति को अच्छे-बुरे का भान नहीं रहता और कभी-कभी वह मर्यादाहीन आचरण कर बैठता है। यदि ऐसी घटना बार-बार होती है तो कोई दूसरा उस व्यक्ति के साथ मेल-जोल नहीं रखता।
यहां तक कि उसके परिवार वाले भी उसका साथ छोड़ देते हैं। एक समय वह भी आता है जब वह एकदम अकेला हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि शराब का सेवन न केवल व्यक्ति बल्कि समाज हित के लिए भी हानिकारक है। इसलिए शराब का सेवन न करना ही बेहतर है ताकि लज्जा बची रहे।

नम्रता बिना समाप्त हो जाता है प्रेम
जीवन में प्रेम का होना बहुत आवश्यक है। प्रेम के बिना जीवन निरर्थक सा लगता है। प्रेम माता-पिता से, पत्नी से या संतान से ही क्यों न हो, लेकिन प्रेम व्यक्त करने के लिए हमें शब्दों का ही सहारा लेना पड़ता है। जो शब्द हमारे प्रेम को अभिव्यक्त करते हैं, वे बहुत ही शालीनता यानी नम्रता से बोले जाते हैं।
इसके विपरीत यदि आप किसी से प्रेम करते हैं और आपके शब्दों में नम्रता नहीं है तो आपका प्रेम नष्ट होने में अधिक समय नहीं लगता। इसलिए तुलसीदासजी ने लिखा है कि नम्रता न होने से प्रेम नष्ट हो जाता है। इसलिए हमें सदैव इस बात का ध्यान रखना चाहिए।

गुणवान को नहीं करना चाहिए अहंकार
गुणवान व्यक्ति की ओर सभी लोग आकर्षित होते हैं और यह स्वभाविक भी है। गुणवान व्यक्ति सभी के आकर्षण का केंद्र होते हैं व समाज में उन्हें आदर व सम्मान भी दिया जाता है। लेकिन जब किसी गुणवान व्यक्ति को उसके गुणों पर अहंकार हो जाता है, तो वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। क्योंकि अहंकार होने पर वह स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है और यही अहंकार उसे विनाश की ओर ले जाता है। रावण में भी बहुत से गुण थे, लेकिन अहंकार के कारण उसका नाश हो गया। इसलिए गुणवान व्यक्ति को कभी अहंकार नहीं करना चाहिए।

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