Ajab Gajab

Status, Shayari, Message, Vrat Katha, Pauranik Katha, Jyotish, News, Hindi Story, Religion, Health, Poem, Jokes, Kavita, Geet, Gazal, Wishes, SMS, Interesting Facts

Menu
  • Pauranik Katha
  • Jyotish
  • Quotes
  • Shayari
  • Amazing India
  • Self Improvment
  • Health
  • Temple
  • Bizarre
Menu

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा, व्रत विधि | Utpanna Ekadashi Vrat Katha, Vrat Vidhi

Posted on November 13, 2017 by Pankaj Goyal

Utpanna Ekadashi Vrat Katha Vrat Vidhi in Hindi | मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहा जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु के शरीर से एक देवी का जन्म हुआ था जिसने दैत्यराज मुर को मारकर भगवान विष्णु की रक्षा की थी। भगवान विष्णु ने एकादशी को उत्पन्न होने के कारण इसे एकादशी देवी का नाम दिया। ऐसी भी मान्यता है कि इसी तिथि से एकादशी व्रत की शुरुआत हुई थी। आइए जानते हैं उत्पन्ना एकादशी की कथा और व्रत विधि।

यह भी पढ़े – एकादशी के द‌िन चावल और चावल से बनी चीजें क्यों नहीं खानी चाह‌िए?

Utpanna Ekadashi Vrat Katha Vrat Vidhi in Hindi

उत्पन्ना एकादशी व्रत विधि | Utpanna Ekadashi Vrat Vidhi in Hindi
श्री सूतजी बाले- “हे विप्रो! भगवान श्रीकृष्ण ने विधि सहित इस एकादशी माहात्म्य को अर्जुन से कहा था। प्रभु में जिनकी श्रद्धा है वे ही इस व्रत को प्रेमपूर्वक सुनते है और इस लोक में अनेक सुखों को भोगकर अन्त में वैकुण्ठ को प्राप्त करते हैं। एक बार अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूँछा- “हे जनार्दन! एकादशी व्रत की क्या महिमा है? इस व्रत को करने से कौन-सा पुण्य मिलता है। इसकी विधि क्या है? सो आप मुझे बताने की कृपा करें।”

अर्जुन के ये वचन सुन भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे अर्जुन! सर्वप्रथम हेमन्त ऋतु के मार्गशीर्ष माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत करना चाहिए। दशमी की सन्ध्या को दातुन करनी चाहिए और रात्रि को भोजन नहीं करना चाहिए। एकादशी को प्रातः संकल्प नियम के अनुसार कार्य करना चाहिए। मध्याह्न को संकल्पपूर्वक स्नान करना चाहिए। स्नान से पूर्व शरीर पर मिट्टी का लेप लगाना चाहिए। स्नान के बाद मस्तक पर चन्दन का तिलक लगाना चाहिए। चन्दन लगाने का मन्त्र इस प्रकार है-

अश्वक्रांते रथक्रांते विष्णुक्रांते वसुंधरे, उद्धृतापि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।
मृत्तिके हर में पाप यन्मया पूर्वक संचितम्, त्वचा हतेन पापेन गच्छामि परमां गतिम्॥

स्नान के उपरान्त धूप, दीप, नैवेद्य से भगवान की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। रात्रि में दीपदान करना चाहिए। ये सभी सात्विक कर्म भक्तिपूर्वक करने चाहिए। रात में जागरण करते हुए श्रीहरि के नाम का जप करना चाहिए तथा किसी भी प्रकार के भोग-विलास या स्त्री-प्रसंग से सर्वथा दूर रहना चाहिए। हृदय में पवित्र एवं सात्विक विचारों को ही स्थान देना चाहिए। इस दिन श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देनी चाहिए और उनसे अपने पापों की क्षमा माँगनी चाहिए। धार्मिकजनों को शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की दोनों एकादशियों को एक समान समझना चाहिए। इनमें भेद-भाव नहीं करना चाहिए।

उत्पन्ना एकादशी व्रत माहात्म्य
ऊपर लिखी विधि के अनुसार जो मनुष्य एकादशी का व्रत करते हैं, उनको शंखोद्धार तीर्थ एवं दर्शन करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह एकादशी व्रत के पुण्य के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं है। हे अर्जुन! व्यतीपात योग में, संक्रान्ति में तथा सूर्य और चन्द्र ग्रहण में दान देने से और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य मनुष्य को एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। हे कुन्ती पुत्र! जो फल वेदपाठी ब्राह्मणों को एक हजार गोदान करने से प्राप्त होता है, उससे दस गुना अधिक पुण्य एकादशी का व्रत करने से मिलता है। दस श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह एकादशी के पुण्य के दसवें भाग के बराबर होता है। निर्जल व्रत करने का आधा फल एक बार भोजन करने के बराबर होता है, अतः एकादशी का व्रत करने पर ही यज्ञ, दान, तप, आदि मिलते हैं अन्यथा नहीं, अतः एकादशी का व्रत अवश्य ही करना चाहिए। इस एकादशी के व्रत में शंख से जल नहीं पीना चाहिए। मांसाहार तथा अन्य निरामिष आहार का एकादशी के व्रत में सर्वथा निषेध है। एकादशी व्रत का फल हजार यज्ञों से भी ज्यादा है।”

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा | Utpanna Ekadashi Vrat Katha in Hindi 
भगवान श्रीकृष्ण के वचन सुन अर्जुन ने कहा- “हे प्रभु! आपने इस एकादशी व्रत के पुण्यों को अनेक तीर्थों के पुण्य से श्रेष्ठ तथा पवित्र क्यों बतलाया है? कृपा करके यह सब आप विस्तारपूर्वक कहिये।”

श्रीकृष्ण बोले- “हे पार्थ! सतयुग में एक महा भयंकर दैत्य हुआ था, उसका नाम मुर था। उस दैत्य ने इन्द्र आदि देवताओं पर विजय प्राप्त कर उन्हें उनके पद से हटा दिया। तब इन्द्र ने भगवान शंकर से प्रार्थना की- ‘हे भोलेनाथ! हम सब देवता, मुर दैत्य के अत्याचारों से दुखी होकर मृत्युलोक में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। राक्षसों के भय से हम बहुत दुख और कष्ट भोग रहे हैं। मैं स्वयं बहुत दुखी और भयभीत हूँ, अन्य देवताओं की तो बात ही क्या है, अतः हे कैलाशपति! कृपा कर आप मुर दैत्य के अत्याचार से बचने का उपाय बतलाइये।’

देवराज की प्रार्थना सुन शंकरजी ने कहा- ‘हे देवेन्द्र! आप भगवान श्रीहरि के पास जाइए। मधु-कैटभ का संहार करने वाले भगवान विष्णु देवताओं को अवश्य ही इस भय से मुक्त करेंगे।’

महादेवजी के आदेशानुसार इन्द्र तथा अन्य देवता क्षीर सागर गए, जहाँ पर भगवान श्रीहरि शेष-शैया पर विराजमान थे।

इन्द्र सहित सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के समक्ष उपस्थित होकर उनकी स्तुति की- ‘हे तीनों लोकों के स्वामी! आप स्तुति करने योग्य हैं, हम सभी देवताओं का आपको कोटि-कोटि प्रणाम है। हे दैत्यों के संहारक! हम आपकी शरण में हैं, आप हमारी रक्षा करें। हे त्रिलोकपति! हम सभी देवता दैत्यों के अत्याचारों से भयभीत होकर आपकी शरण में आए हैं। इस समय दैत्यों ने हमें स्वर्ग से निकाल दिया है और हम सभी देवता बड़ी ही दयनीय स्थिति में मृत्युलोक में विचरण कर रहे हैं। अब आप ही हमारे रक्षक हैं! रक्षा कीजिये। हे कैलाशपति! हे जगन्नाथ! हमारी रक्षा करें।’

देवताओं की करुण पुकार सुनकर, भगवान श्रीहरि बाले- ‘हे देवगणो! वह कौन-सा दैत्य है, जिसने देवताओं को जीत लिया है? आप सभी देवगण किसके भय से पृथ्वीलोक में भटक रहे हैं? क्या वह दैत्य इतना बलवान है, जिसने इन्द्र सहित सभी देवताओं को जीत लिया है? तुम निर्भय होकर मुझे सब हाल बताओ।

भगवान विष्णु के इन स्नेहमयी वचनों को सुनकर देवेन्द्र ने कहा- ‘हे प्रभु! प्राचीन काल में ब्रह्मवंश में उत्पन्न हुआ नाड़ी जंगम नाम का एक असुर था, जिसका मुर नामक एक पुत्र है, जो चन्द्रवती नामक नगरी में निवास करता है, जिसने अपने बल से मृत्युलोक और देवलोक को जीत लिया हैं और सब देवताओं को देवलोक से निकालकर, अपने दैत्य कुल के असुरों को इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण, चन्द्रमा आदि लोकपाल बना दिया है। वह स्वयं सूर्य बनकर पृथ्वी को तापता है और स्वयं मेघ बनकर जल की वर्षा करता है, अतः आप इस बलशाली भयानक असुर का संहार करके देवताओं की रक्षा करें।’

देवेन्द्र के मुख से ऐसे वचन सुन भगवान विष्णु बोले- ‘हे देवताओं! मैं आपके शत्रु का शीघ्र ही संहार करूँगा। आप सब इसी समय मेरे साथ चन्द्रवती नगरी चलिए।’

देवताओं की पुकार पर भगवान विष्णु तुरन्त ही उनके साथ चल दिए। उधर दैत्यराज मुर ने अपने तेज से जान लिया था कि श्रीविष्णु युद्ध की इच्छा से उसकी राजधानी की तरफ आ रहे हैं, अतः अपने राक्षस योद्धाओं के साथ वह भी युद्ध भूमि में आकर गरजने लगा। देखते-ही-देखते युद्ध शुरू हो गया। युद्ध शुरू होने पर अनगिनत असुर अनेक अस्त्रों-शस्त्रों को धारण कर देवताओं से युद्ध करने लगे, किन्तु देवता तो पहले ही डरे हुए थे, वह अधिक देर तक राक्षसों का सामना न कर सके और भाग खड़े हुए। तब भगवान विष्णु स्वयं युद्ध-भूमि में आ गए। दैत्य पहले से भी ज्यादा जोश में भरकर भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे। वे अपने अस्त्र-शस्त्रों से उन पर भयंकर प्रहार करने लगे। दैत्यों के आक्रमण वारों को श्रीविष्णु अपने चक्र और गदा के प्रहारों से नष्ट करने लगे। इस युद्ध में अनेक दैत्य सदा के लिए मृत्यु की गोद में समा गए, किन्तु दैत्यराज मुर भगवान विष्णु के साथ निश्चल भाव से युद्ध करता रहा। उसका तो जैसे अभी बाल भी बांका नहीं हुआ था। वह बिना डरे युद्ध कर रहा था। भगवान विष्णु मुर को मारने के लिए जिन-जिन शस्त्रों का प्रयोग करते, वे सब उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगते। अनेक अस्त्रों-शस्त्रों का प्रयोग करने पर भी भगवान विष्णु उससे जीत न सके। तब वे आपस में मल्ल युद्ध करने लगे। भगवान श्रीहरि उस असुर से देवताओं के लिए सहस्र वर्ष तक युद्ध करते रहे, किन्तु उस असुर से न जीत सके। अन्त में भगवान विष्णु शान्त होकर विश्राम करने की इच्छा से बदरिकाश्रम स्थित अड़तीस कोस लम्बी एक द्वार वाली हेमवती नाम की एक गुफा में प्रवेश कर गए।

हे अर्जुन! उस गुफा में प्रभु ने शयन किया। भगवान विष्णु के पीछे-पीछे वह दैत्य भी चला आया था। भगवान श्रीहरि को सोता देखकर वह उन्हें मारने को तैयार हो गया। वह सोच रहा था कि मैं आज अपने चिर शत्रु को मारकर हमेशा-हमेशा के लिए निष्कण्टक हो जाऊँगा, परन्तु उसकी यह इच्छा पूर्ण न हो सकी, क्योंकि उसी समय भगवान विष्णु की देह से दिव्य वस्त्र धारण किए एक अत्यन्त मोहिनी कन्या उत्पन्न हुई और राक्षस को ललकारकर उससे युद्ध करने लगी।

उस कन्या को देखकर राक्षस को घोर आश्चर्य हुआ और वह सोचने लगा कि यह ऐसी दिव्य कन्या कहाँ से उत्पन्न हुई और फिर वह असुर उस कन्या से लगातार युद्ध करता रहा, कुछ समय बीतने पर उस कन्या ने क्रोध में आकर उस दैत्य के अस्त्र-शस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। उसका रथ तोड़ डाला। अब तो उस दैत्य को बड़ा ही क्रोध आया और वह सारी मर्यादाएँ भंग करके उस कन्या से मल्ल युद्ध करने लगा।

उस तेजस्वी कन्या ने उसको धक्का मारकर मुर्च्छित कर दिया और उसकी मूर्च्छा टूटने से पूर्व ही उसका सिर काटकर धड़ से अलग कर दिया।

सिर काटते ही वह असुर पृथ्वी पर गिरकर मृत्यु को प्राप्त हुआ बाकी बचे असुर अपने राजा का ऐसा दुःखद अन्त देखकर भयभीत होकर पाताल लोक में भाग गए। भगवान विष्णु जब निद्रा से जागे तो उस असुर को मरा देखकर उन्हें घोर आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि इस महाबली को किसने मारा है?

तब वह तेजस्वी कन्या श्रीहरि से हाथ जोड़कर बोली- ‘हे जगदीश्वर! यह असुर आपको मारने को उद्यत था, तब मैंने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इस असुर का वध किया है।’

कन्या की बात सुन भगवान बोले- ‘तुमने इस असुर को मारा है, अतः हे कन्या! मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। इसे मारकर तुमने तीनों लोकों के देवताओं के कष्ट को हरा है, इसलिए तुम अपनी इच्छानुसार वरदान मांग लो। मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करूँगा।’

भगवान की बात सुन कन्या बोली- ‘हे प्रभु! मुझे यह वरदान दीजिये कि जो भी मनुष्य या देव मेरा व्रत करे, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएँ और अन्त में उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हो। मेरे व्रत का आधा फल रात्रि को मिले और उसका आधा फल एक समय भोजन करने वाले को मिले। जो श्रद्धालु भक्तिपूर्वक मेरे व्रत को करें, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक को प्राप्त करें। जो मनुष्य मेरे व्रत में दिन तथा रात्रि को एक बार भोजन करे, वह धन-धान्य से भरपूर रहे। कृपा करके मुझे ऐसा वरदान दीजिये।’

भगवान श्रीहरि ने कहा- ‘हे कन्या! ऐसा ही होगा। मेरे और तुम्हारे भक्त एक ही होंगे और अन्त में संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त होकर मेरे लोक को प्राप्त करेंगे। हे कल्याणी! तुम एकादशी को पैदा हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम भी एकादशी हुआ और क्योंकि तुम मेरे अंश से उत्पन्न हुई हो, इसलिए संसार मे तुम उत्पन्ना एकादशी के नाम से जानी जाओगी तथा जो मनुष्य इस दिन व्रत करेंगे, उनके समस्त पाप समूल नष्ट हो जाएँगे। तुम मेरे लिए अब तीज, अष्टमी, नवमी और चौदस से भी अधिक प्रिय हो। तुम्हारे व्रत का फल सब तीर्थों के फल से भी महान होगा। यह मेरा अकाट्य कथन है।’

इतना कहकर, भगवान श्रीहरि उसी स्थान पर अन्तर्धान हो गए।”

श्रीकृष्ण ने कहा- “हे पाण्डु पुत्र! एकादशी के व्रत का फल सभी व्रतों व सभी तीर्थों के फल से महान है। एकादशी व्रत करने वाले मनुष्यों के शत्रुओं का मैं जड़ से नाश कर देता हूँ और व्रत करने वाले को मोक्ष प्रदान करता हूँ। उन मनुष्यों के जीवन के जो भी कष्ट होते हैं। मैं उन्हें भी दूर कर देता हूँ। अर्थात मुझे अत्यन्त प्रिय एकादशी के व्रत को करने वाला प्राणी सभी ओर से निर्भय और सुखी होकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त होता है। हे कुन्ती पुत्र! यह मैंने तुम्हें एकादशी की उत्पत्ति के विषय में बतलाया है। एकादशी व्रत सभी पापों को नष्ट करने वाला और सिद्धि प्रदान करने वाला है। श्रेष्ठ मनुष्यों को दोनों पक्षों की एकादशियों को समान समझना चाहिए। उनमें भेद-भाव करना उचित नहीं है। जो मनुष्य एकादशी माहात्म्य का श्रवण व पठन करेंगे, उन्हें अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होगा। यह मेरा अकाट्य वचन है।”

सम्पूर्ण पौराणिक कहानियाँ यहाँ पढ़े – पौराणिक कथाओं का विशाल संग्रह

अन्य संबंधित लेख

  • तुलसी विवाह व्रत कथा | Tulsi Vivah Vrat Katha
  • Jal Jhulani Ekadashi | जल झुलनी एकादशी व्रत कथा | व्रत विधि | महत्व
  • देवशयनी एकादशी – व्रत कथा, महत्व व पूजन विधि
  • Vaman Ekadashi | वामन एकादशी व्रत कथा | व्रत विधि | महत्व
  • Indira Ekadashi | इंदिरा एकादशी व्रत कथा, व्रत विधि व महत्व

Related posts:

स्कंद षष्ठी व्रत एवं पूजन विधि | महत्व | भगवान कार्तिकेय का जन्म कथा
मत्स्य जयंती की पौराणिक कथा
गुड़ी पड़वा क्यों, कैसे मनाते है | पौराणिक कथा
नारी गहने क्यों पहनती है? गहनों का महत्व
गोगाजी की जीवनी और गोगा नवमी की कथा
उनाकोटी - 99 लाख 99 हजार 999 मूर्तियां, क्या है रहस्य
नागपंचमी की पौराणिक कथाएं
युधिष्ठर को पूर्ण आभास था, कि कलयुग में क्या होगा ?
वरुथिनी एकादशी का महत्व, व्रत विधि एवं व्रत कथा, वरुथिनी एकादशी
आखिर ! भगवान श्री कृष्ण का दामोदर नाम क्यों पडा ।

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Daily Horoscope

05/07/26

Pages

  • AdTest
  • Contact Us
  • Disclaimer
  • Guest Post & Sponsored Post
  • Privacy Policy
©2026 Ajab Gajab | Design: Newspaperly WordPress Theme