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Buddha Jayanti In Hindi

बुद्ध जयंती | Buddha Jayanti | बुद्ध पूर्णिमा | Buddha Paurnima |

Posted on April 23, 2018May 1, 2018 by Pankaj Goyal

Buddha Jayanti In Hindi | Buddha Paurnima in Hindi | Buddha Jayanti Story In Hindi | Buddha Paurnima Strory in Hindi | वैशाख मास की पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा या बुद्ध जयंती का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन से महात्मा बुद्ध के जीवन की 3 विशेष घटनाएं जुडी है। वैशाख पूर्णिमाके दिन ही महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था, इसी दिन उन्हें ज्ञान (बुद्धत्व) की प्राप्ति हुई थी और इसी दिन उन्हें निर्वाण हुआ था। इसलिए बुद्ध पूर्णिमा या बुद्ध जयंती बौद्धों का सबसे बड़ा त्यौहार है। पुरे विश्व में बौद्ध अनुयायी इस दिन को बड़े ही उल्लास से बनाते हैं। हिन्दू धर्म में बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवा अवतार माना जाता है। अतः हिन्दुओं के लिए भी यह दिन पवित्र माना जाता है।

Buddha Jayanti In Hindi

महात्मा बुद्ध का जन्म
भगवान बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में कपिलवस्तु के पास लुम्बिनी नामक स्थान पे हुआ था। बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। उनके पिता का नाम शुद्धोधन एवं माताजी के नाम मायादेवी था। । उनकी माता उनको सात दिन का ही छोड़कर मर गई थीं और उनका लालन- पालन सेवक और दासियों द्वारा किया गया था। इनके जन्म के समय किसी ज्योतिषी ने कह दिया था कि- ये आगे चलकर यदि घर में रहे तो एक पराक्रमी सम्राट बनेंगे और जो गृह त्यागी हो गए तोबडे़ धर्म प्रचारक और लोकसेवी सिद्ध होंगे। इस भविष्य कथन से राजा शुद्धोदन का हृदय शंकाकुल हो गया था और उन्होंने यह व्यवस्था कर रखी थी कि राजकुमार को सदैव अत्यंत सुख और प्रसन्नता के वातावरण में रखा जाए और उनके सामने सांसारिक दुःख, रोग- शोक की चर्चा भूलकर भी न की जाए। यही कारण था कि राजभवन के दास- दासी उनको सदैव आमोद- प्रमोद और मनोरंजन में लगाए रहते थे और संसार की वास्तविक अवस्था के संपर्क मे उनको कभी नहीं आने दिया जाता था। 16 वर्ष की उम्र में सिद्धार्थ का विवाह राजकुमारी यशोधरा से कर दिया गया जिनसे इनका एक पुत्र राहुल पैदा हुआ।

पर होनी को कौन टाल सकता है। एक दिन जब वह भ्रमण पर निकले तो उन्होंने एक वृद्ध को देखा जिसकी कमर झुकी हुई थी और वह लगातार खांसता हुआ लाठी के सहारे चला जा रहा था। थोड़ी आगे एक मरीज को कष्ट से कराहते देख उनका मन बेचैन हो उठा। उसके बाद उन्होंने एक मृतक की अर्थी देखी, जिसके पीछे उसके परिजन विलाप करते जा रहे थे। ये सभी दृश्य देख उनका मन क्षोभ और वितृष्णा से भर उठा, तभी उन्होंने एक संन्यासी को देखा जो संसार के सभी बंधनों से मुक्त भ्रमण कर रहा था। इन सभी दृश्यों ने सिद्धार्थ को झकझोर कर रख दिया और उन्होंने संन्यासी बनने का निश्चय कर लिया। तब 19 वर्ष की आयु में एक रात सिद्धार्थ गृह त्याग कर इस क्षणिक संसार से विदा लेकर सत्य की खोज में निकल पड़े।

बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति
गृहत्याग के बाद उन्होंने सात दिन ‘अनुपीय’ नामक ग्राम में बिताए। फिर गुरु की खोज में वह मगध की राजधानी पहुंचे जहां कुछ दिनों तक वह ‘आलार कालाम’ नामक तपस्वी के पास रहे। इसके बाद वह एक आचार्य के साथ भी रहे लेकिन उन्हें कहीं संतोष नहीं मिला। अंत में ज्ञान की प्राप्ति के लिए उन्होंने स्वयं ही तपस्या शुरू कर दी। कठोर तप के कारण उनकी काया जर्जर हो गई थी लेकिन उन्हें अभी तक ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई थी। घूमते-घूमते वह एक दिन गया में उरुवेला के निकट निरंजना (फल्गु) नदी के तट पर पहुंचे और वहां एक पीपल के वृक्ष के नीचे स्थिर भाव में बैठ कर समाधिस्थ हो गए। वहां बुद्ध छ: वर्षों तक समाधिस्थ रहने के बाद वैशाख पूर्णिमा के दिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वह महात्मा गौतम बुद्ध कहलाए। उस स्थान को ‘बोध गया’ व पीपल का पेड़ बोधि वृक्ष कहा जाता है। इन छः वर्षों के समय को इसे बौद्ध साहित्य में ‘संबोधि काल’ कहा गया है।

महात्मा बुद्ध का निर्वाण
महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया था एवं उन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना की। 483 ई.पू. में कुशीनगर में बैशाख पूणिर्मा के दिन अमृत आत्मा मानव शरीर को छोङ ब्रहमाण्ड में लीन हो गई। इस घटना को ‘महापरिनिर्वाण’ कहा जाता है।

बुद्ध पूर्णिमा / बुद्ध जयंती से जुडी जरुरी बातें

  • श्रीलंकाई इस दिन को ‘वेसाक’ उत्सव के रूप में मनाते हैं जो ‘वैशाख’ शब्द का अपभ्रंश है।
  • इस दिन बौद्ध घरों में दीपक जलाए जाते हैं और फूलों से घरों को सजाया जाता है।
  • दुनियाभर से बौद्ध धर्म के अनुयायी बोधगया आते हैं और प्रार्थनाएँ करते हैं।
  • बौद्ध धर्म के धर्मग्रंथों का निरंतर पाठ किया जाता है।
  • मंदिरों व घरों में अगरबत्ती लगाई जाती है। मूर्ति पर फल-फूल चढ़ाए जाते हैं और दीपक जलाकर पूजा की जाती है।
  • बोधिवृक्ष की पूजा की जाती है। उसकी शाखाओं पर हार व रंगीन पताकाएँ सजाई जाती हैं। जड़ों में दूध व सुगंधित पानी डाला जाता है। वृक्ष के आसपास दीपक जलाए जाते हैं।
  • इस दिन मांसाहार का परहेज होता है क्योंकि बुद्ध पशु हिंसा के विरोधी थे।
  • इस दिन किए गए अच्छे कार्यों से पुण्य की प्राप्ति होती है।
  • पक्षियों को पिंजरे से मुक्त कर खुले आकाश में छोड़ा जाता है।
  • गरीबों को भोजन व वस्त्र दिए जाते हैं।
  • दिल्ली संग्रहालय इस दिन बुद्ध की अस्थियों को बाहर निकालता है जिससे कि बौद्ध धर्मावलंबी वहां आकर प्रार्थना कर सकें।

महात्मा बुद्ध से सम्बंधित अन्य लेख –

  • राजकुमार सिद्धार्थ के गौतम बुद्ध बनने की कहानी
  • कहानी आम्रपाली की, जिसे उसकी खूबसूरती ने बना दिया था नगरवधू
  • भगवान बुद्ध की तीन प्रेरक कहानियां
  • गौतम बुद्ध के अनमोल विचार
  • Buddha Jayanti Messages in Hindi | बुद्ध जयंती शुभकामना संदेश

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