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Vaishakh Maas Mahatmya

वैशाख मास का अद्भुत रहस्य

Posted on April 10, 2018 by Pankaj Goyal

Vaishakh Maas Mahatmya | Vaishakh Maas Mahima | वैशाख मास में छत्र दान से हेमन्त का उद्धार

नारदजी कहते हैं – एक समय विदेहराज जनक के घर दोपहर के समय श्रुतदेव नाम से विख्यात एक श्रेष्ठ मुनि पधारे, जो वेदों के ज्ञाता थे। उन्हें देखकर राजा बड़े उल्लास के साथ उठकर खड़े हो गए और मधुपर्क आदि सामग्रियों से उनकी विधिपूर्वक पूजा करके राजा ने उनके चरणोदक को अपने मस्तक पर धारण किया। इस प्रकार स्वागत-सत्कार के पश्चात जब वे आसन पर विराजमान हुए तब विदेहराज के प्रश्न के अनुसार वैशाख मास के माहात्म्य का वर्णन करते हुए वे इस प्रकार बोले।

Vaishakh Maas Mahatmya

श्रुतदेव ने कहा – राजन् ! जो लोग वैशाख मास में धूप से सन्तप्त होने वाला माहात्मा पुरुषों के ऊपर छाता लगाते हैं, उन्हें अनन्त पुण्य की प्राप्ति होती है। इस विषय में एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं।

पहले वंग देश में हेमकान्त नाम से विख्यात एक राजा थे। वे कुशकेतु के पुत्र परम बुद्धिमान और शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ थे। एक दिन वे शिकार खेलने में आसक्त होकर एक गहन वन में जा घुसे। वहाँ अनेक प्रकार के मृग और वराह आदि जन्तुओं को मारकर जब वे बहुत थक गए तब दोपहर के समय मुनियों के आश्रम पर आए। उस समय आश्रम पर उत्तम व्रत का पालन करने वाले शतर्चि नाम वाले ऋषि समाधि लगाए बैठे थे, जिन्हें बाहर के कार्यों का कुछ भी ज्ञान नहीं होता था। उन्हें निश्चल बैठे देख राजा को बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने उन महात्माओं को मार डालने का निश्चय किया तब उन ऋषियों के दस हजार शिष्यों ने राजा को मना करते हुए कहा – “ओ खोटी बुद्धिवाले नरेश ! हमारे गुरु लोग इस समय समाधि में स्थित हैं, बाहर कहाँ क्या हो रहा है – इसको ये नहीं जानते इसलिए इन पर तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिए।”

तब राजा ने क्रोध से विह्वल होकर शिष्य़ों से कहा – द्विजकुमारों ! मैं मार्ग से थका-माँदा यहाँ आया हूँ। अत: तुम्हीं लोग मेरा आतिथ्य करो। राजा के ऎसा कहने पर वे शिष्य बोले – “हम लोग भिक्षा माँगकर खाने वाले हैं। गुरुजनों ने हमें किसी के आतिथ्य के लिए आज्ञा नहीं दी है। हम सर्वथा गुरु के अधीन हैं। अत: तुम्हारा आतिथ्य कैसे कर सकते हैं।” शिष्यों का यह कोरा उत्तर पाकर राजा ने उन्हें मारने के लिए धनुष उठाया और इस प्रकार कहा – “मैंने हिंसक जीवों और लुटेरों के भय आदि से जिनकी अनेकों बार रक्षा की है, जो मेरे दिए हुए दानों पर ही पलते हैं, वे आज मुझे ही सिखलाते चले हैं। ये मुझे नहीं जानते, ये सभी कृतघ्न और बड़े अभिमानी हैं। इन आततायियों को मर डालने पर भी मुझे कोई दोष नहीं लगेगा।” ऎसा कहकर वे कुपित हो धनुष से बाण छोड़ने लगे।

बेचारे शिष्य आश्रम छोड़कर भय से भाग चले। भागने पर भी हेमकान्त ने उनका पीछा किया और तीन सौ शिष्यों को मर गिराया। शिष्यों के भाग जाने पर आश्रम पर जो कुछ सामग्री थी उसे राजा के पापात्मा सैनिकों ने लूट लिया। राजा के अनुमोदन से ही उन्होंने वहाँ इच्छानुसार भोजन किया। तत्पश्चात दिन बीतते-बीतते राजा सेना के साथ अपनी पुरी में आ गए। राजा कुशकेतु ने जब अपने पुत्र का यह अन्यायपूर्ण कार्य सुना तब उसे राज्य करने के अयोग्य जानकर उसकी निन्दा करते हुए उसे देश निकाला दे दिया। पिता के त्याग देने पर हेमकान्त घने वन में चला गया। वहाँ उसने बहुत वर्षों तक निवास किया। ब्रह्महत्या उसका सदा पीछा करती रहती थी इसलिए वह कहीं भी स्थिरतापूर्वक रह नहीं पाता था।

इस प्रकार उस दुष्टात्मा के अठ्ठाईस वर्ष व्यतीत हो गए। एक दिन वैशाख मास में जब दोपहर का समय हो रहा था, महामुनि त्रित तीर्थयात्रा के प्रसंग से उस वन में आए। वे धूप से अत्यन्त संतप्त और तृषा से बहुत पीड़ित थे इसलिए किसी वृक्षहीन प्रदेश में मूर्च्छित होकर गिर पड़े। दैवयोग से हेमकान्त उधर आ निकला, उसने मुनि को प्यास से पीड़ित, मूर्च्छित और थका-माँदा देख उन पर बड़ी दया की। उसने पलाश के पत्तों से छत्र बनाकर उनके ऊपर आती हुई धूप का निवारण किया। वह स्वयं मुनि के मस्तक पर छाता लगाए खड़ा हुआ और तूँबी में रखा हुआ जल उनके मुँह में डाला।

इस उपचार से मुनि को चेत(होश) हो आया और उन्होंने क्षत्रिय के दिए हुए पत्ते के छाते को लेकर अपनी व्याकुलता दूर की। उनकी इन्द्रियों में कुछ शक्ति आई और वे धीरे-धीरे किसी गाँव में पहुँच गए। उस पुण्य के प्रभाव से हेमकान्त की तीन सौ ब्रह्महत्याएँ नष्ट हो गईं। इसी समय यमराज के दूत हेमकान्त को लेने के लिए वन में आए। उन्होंने उसके प्राण लेने के लिए संग्रहणी रोग पैदा किया। उस समय प्राण छूटने की पीड़ा से छटपटाते हुए हेमकान्त ने तीन अत्यन्त भयंकर यमदूतों को देखा जिनके बाल ऊपर की ओर उठे हुए थे। उस समय अपने कर्मों को याद करके वह चुप हो गया। छत्र-दान के प्रभाव से उसको विष्णु भगवान का स्मरण हुआ।

उसके स्मरण करने पर महाविष्णु ने विष्वक् सेन से कहा – “तुम शीघ्र जाओ, यमदूतों को रोकों, हेमकान्त की रक्षा करो। अब यह निष्पाप और मेरा भक्त हो गया है। उसे नगर में ले जाकर उसके पिता को सौंप दो। साथ ही मेरे कहने से कुशकेतु को यह समझाओ कि तुम्हारे पुत्र ने अपराधी होने पर भी वैशाख मास में छत्र-दान करके एक मुनि की रक्षा की है। अत: वह पाररहित हो गया है। इस पुण्य के प्रभाव से वह मन और इन्द्रियों को अपने वश में रखने वाला दीर्घायु, शूरता और उदारता आदि गुणों से युक्त तथा तुम्हारे समान गुणवान हो गया है। इसलिए अपने महाबली पुत्र को तुम राज्य का भार सँभालने के लिए नियुक्त करो। भगवान विष्णु ने तुम्हें ऎसी ही आज्ञा दी है। इस प्रकार राजा को आदेश देकर हेमकान्त को उनके अधीन करके यहाँ लौट आओ।”

भगवान विष्णु का यह आदेश पाकर महाबली विष्वक् सेन ने हेमकान्त के पास आकर यमदूतों को रोका और अपने कल्याणमय हाथों से उसके सब अंगों में स्पर्श किया। भगवद्भक्त के स्पर्श से हेमकान्त की सारी व्याधि क्षण भर में दूर हो गई। तदनन्तर विष्वक् सेन उसके साथ राजा की पुरी में गए। उन्हें देखकर महाराज कुशकेतु ने आश्चर्ययुक्त हो भक्तिपूर्वक मस्तक झुकाकर पृथ्वी पर साष्टांग प्रणाम किया और भगवान के पार्षद का अपने घर में प्रवेश कराया। वहाँ नाना प्रकार के स्तोत्रों से उनकी स्तुति तथा वैभवों से उनका पूजन किया। तत्पश्चात महाबली विष्वक् सेन ने अत्यन्त प्रसन्न होकर राजा को हेमकान्त के विषय में भगवान विष्णु ने जो संदेश दिया था, वह सब कह सुनाया। उसे सुनकर कुशकेतु ने पुत्र को राज्य पर बिठा दिया और स्वयं विष्वक् सेन की आज्ञा लेकर पत्नी सहित वन को प्रस्थान किया।

तदनन्तर महामना विष्वक् सेन हेमकान्त से पूछकर और उसकी प्रशंसा करके श्वेतद्वीप में भगवान विष्णु के समीप चले गए तब से राजा हेमकान्त वैशाख मास में बताए हुए भगवान की प्रसन्नता को बढ़ाने वाले शुभ धर्मों का प्रति वर्ष पालन करने लगे। वे ब्राह्मणभक्त, धर्मनिष्ठ, शान्त, जितेन्द्रिय, सब प्राणियों के प्रति दयालु और संपूर्ण यज्ञों की दीक्षा में स्थित रहकर सब प्रकार की संपदाओं से संपन्न हो गए। उन्होंने पुत्र-पौत्र आदि के साथ समस्त भोगों का उपभोग करके भगवान विष्णु का लोक प्राप्त किया। वैशाख मास सुख से साध्य, अतिशय पुण्य प्रदान करने वाला है। पापरूपी ईंधन को अग्नि की भाँति जलाने वाला, परम सुलभ तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – चारों पुरुषार्थों को देने वाला है।

आचार्य, डा.अजय दीक्षित

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