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चंद्रशेखर के आज़ाद बनने की गाथा

Posted on November 18, 2014January 15, 2019 by Pankaj Goyal

Chandra Shekhar Azad Story in Hindi : आज़ादी  देश की बलिवेदी पर अनगिनत क्रांतिकारी बलिदान हो आ गए।  उनमें से एक प्रमुख क्रांतिकारी चंदशेखर आज़ाद थे।  उनका जन्म 23 जुलाई, 1906 को श्रावण महीने में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को सोमवार के दिन अलीराजपुर (मध्य प्रदेश) के एक गाँव भावरा में हुआ।  बालक अत्यंत सुन्दर, तेजस्वी था, इसलिए उसका नामकरण उसके गुण, रूप के अनुरूप ही रखा गया ‘चंद्रशेखर’। बचपन में चंद्रशेखर स्वास्थ्य की द्रष्टि से बहुत कमजोर थे।

Chandra Shekhar Azad Story, Kahani, Biography in Hindi

चंद्रशेखर कट्टर सनातनधर्मी ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे।  इनके पिता नेक, धर्मनिष्ट और दीं-ईमान के पक्के थे और उनमें पांडित्य का कोई अहंकार नहीं था। वे बहुत स्वाभिमानी और दयालु प्रवर्ति के थे।  घोर गरीबी में उन्होंने दिन बिताए थे और इसी कारण चंद्रशेखर की अच्छी शिक्षा-दीक्षा नहीं हो पाई, लेकिन पढ़ना-लिखना उन्होंने गाँव के ही एक बुजुर्ग  मनोहरलाल त्रिवेदी से सीख लिया था, जो उन्हें घर पर निःशुल्क पढ़ाते थे।

बचपन से ही चंद्रशेखर बहुत निर्भीक थे।  एक बार दीवाली के समय पर चंद्रशेखर कहीं से रंगीन रोशनी करने वाली दियासलाई ले आए।  वह उस दियासलाई की एक-एक करके तीली जलाते औए फिर उसकी लौ को कुतूहल की दृष्टि से देखते।  उनके कई साथी उनके साथ खड़े होकर यह खेल देख रहे थे।  किसी की समझ में यह नहीं आ रहा था की तीली रोशनी कैसे करती है।

“जब एक तीली जलाने पर इतनी रोशनी करती है, तब सारी तीलियाँ एक साथ जलाने पर कितनी रोशनी होगी ?’- चंद्रशेखर ने अपने मित्रों से कहा।  लेकिन इन सब तीलियों को एक साथ जलाए कौन ? इस प्रशन पर सभी मौन थे और एक अनजाना-सा डर सभी के मनो में व्याप्त था।  परन्तु चंद्रशेखर ने तो जैसे भय का नाम ही नहीं सुना था और उसी निर्भीकता के साथ वे बोले-“देखो ! मैं जलाकर दिखाता हूँ” ।

ऐसा कहकर चंद्रशेखर ने सारी तीलियाँ एक साथ जला दी।  तीलियाँ फक्क से जल उठी और तेज़ रोशनी हुई।  तीलियों के एक साथ जलने से चंद्रशेखर का हाथ भी जल गया, पर वह रोया नहीं।  उनके सहपाठियों को लगा की चंद्रशेखर अपने घाव का इलाज़ कराते वक़्त तो शायद रोए, परन्तु उन्हें आश्चर्ये हुआ जब चंद्रशेखर ने हँसते-हँसते, उसी निर्भीकता के साथ अपने हाथ की पट्टी कराई।  चंद्रशेखर का बचपन निर्भीकता की ऐसी ही कहानियों से सरोबार रहा।

बचपन से ही चंद्रशेखर में भारतमाता को स्वतंत्र कराने की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी।  इसी कारन उन्होनें स्वयं अपना नाम आज़ाद रख लिया था। उनके जीवन की एक घटना ने उन्हें सदा के लिए क्रांति के पथ पर अग्रसर कर दिया।  13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला बाग़ अमृतसर में जनरल डायर ने जो नरसंहार किया, उसके विरोध में तथा रौलट एक्ट के विरुद्ध जो जन-आंदोलन प्रारम्भ हुआ था, वह दिन प्रतिदिन ज़ोर पकड़ता जा रहा था।

इसी आंदोलन के दौरान प्रिन्स ऑफ़ वेल्स बम्बई आए और वे जहाँ-जहाँ गए, वहां-वहां भारतियों ने उनका बहिष्कार किया।  जब राजकुमार बनारस पहुंचने वाले थे, उस समय वहां भी उनके बहिष्कार का जुलूस निकला।  बनारस के दशाश्वमेघ घाट वाले जुलूस में युवा चंद्रशेखर अपने साथियों के साथ शामिल थे।  पुलिस वाले जुलूस को तितर-बितर करने के लिए लाठी घुमाते हुए आ रहे थे।  यह देख चंद्रशेखर के मित्रगण लाठी के प्रहार से बचने के लिये इधर-उधर फ़ैल गए।  केवल चंद्रशेखर ही अपने स्थान पर निडर खड़े रहे।

इसी बीच कुछ आंदोलनकर्ता, जो एक विदेशी कपडे की दूकान पर धरना दे रहे थे, उन पर पुलिस का एक दरोगा डंडे बरसाने लगा। यह अत्याचार चंद्रशेखर से देखा नहीं गया और उन्होंने पास पड़ा एक पत्थर उठाकर उस दरोगा के माथे पर दे मारा।  निशाना अचूक था।  दरोगा घायल हो कर वही जमीन पर गिर गया, लेकिन चंद्रशेखर को ऐसा करते हुए एक सिपाही ने देख लिया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन इस गिरफ्तारी से चंद्रशेखर जरा भी भयभीत या विचलित नहीं हुए।  उनकी गिरफ्तारी के बाद पुलिस आलों ने उनके कमरे की तलाशी ली तो उनके कमरे में लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, महात्मा गांधी समेत अनेक राष्ट्रीय नेताओं के चित्र मिले, जिसके आधार पर पुलिस वालों ने उन पर राष्ट्रद्रोह का आरोप लगा दिया।

इसके बाद उन्हें थाने में ले जाकर हवालात में बंद कर दिया गया। दिसंबर की कड़ाके वाली ठण्ड की रात थी और ऐसे में चंद्रशेखर को ओढ़ने-बिछाने के लिए कोई बिस्तर नहीं दिया गया; क्योंकि पुलिस वालों का ऐसा सोचना था की यह लड़का ठण्ड से घबरा जाएगा और माफ़ी मांग लेगा, किन्तु ऐसा नहीं हुआ।  यह देखने के लिए लड़का क्या रहा है और शायद वह ठंड  ठिठुर रहा होगा, आधी रात को इंस्पेक्टर ने चंद्रशेखर की कोठरी का ताला खोला तो वह यह देख कर आशर्यचकित हो गया की चंद्रशेखर दंड-बैठक लगा रहे थे और उस कड़कड़ाती सर्दी में भी पसीने से नहा रहे थे।

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दूसरे दिन चंद्रशेखर को न्यायालय में मजिस्ट्रेट के सामने ले जाया गया।  उन दिनों बनारस  बहुत कठोर मजिस्ट्रेट नियुक्त था। बात-बात में वकीलों को वह सुना-सुनाकर कहता की किसी को पकड़कर छोड़ना तो चिड़ीमार का काम होता है, किसी मजिस्ट्रेट का काम थोड़े ही है ! मजिस्ट्रेट का काम तो सज़ा देना होता है। पुलिस वाले अपराधी को सामने लाए की सज़ा दो। उसी अँगरेज़ मजिस्ट्रेट के सामने 15 वर्षीय चंद्रशेखर को पुलिस ने पेश किया।

मजिस्ट्रेट ने बालक से पूछा- “तुम्हारा नाम?” बालक ने  उत्तर दिया- “आज़ाद”। “पिता का नाम ?”- मजिस्ट्रेट ने कड़े स्वर में पूछा।  ऊंची गर्दन किए हुए बालक ने तुरंत उत्तर दिया- “स्वाधीन”। युवक की हेकड़ी देखकर न्यायाधीश क्रोध से भर उठा। उसने फिर पूछा- “तुम्हारा घर कहाँ है?” चंद्रशेखर ने गर्व से उत्तर दिया- “जेल की कोठरी”।  न्यायाधीश ने क्रोध में चंद्रशेखर को 15 बेंत लगाने की सज़ा दी।

बेंत लगाने के लिए चंद्रशेखर को जेलखाने में ले जाया गया। बनारस का जेलर बड़े ही क्रूर स्वभाव का व्यक्ति था।  कैदियों को सजा देने में उसे बड़ा आनंद आता था और इस कार्य में वह क्रूरता की चरम सीमा पर  पहुँच जाता था।  इसलिए बेंत लगवाने का कार्य उसे ही सौपा गया।  कोड़े लगवाने के लिए उसने चंद्रशेखर को तख्ते से बंधवा दिया।  इस समय उनके शरीर पर एक लंगोट के सिवाय अन्य कोई वस्त्र नहीं था। शरीर से खाल अलग न हो जाए, इसके लिए उन दिनों कैदियों के शरीर पर विशेष लेप लगाया जाता था। लेप लगाने के बाद उसने बेंत लगाने वाले जल्लाद को बेंत लगाने का आदेश दिया और फिर चंद्रशेखर को तड़ातड़ बेंत पड़ने लगे।

लेकिन चंद्रशेखर भी अपनी हिम्मत के पक्के थे। उनकी हिम्मत व सहनशीलता ने बनारस जे उस निर्दयी जेलर को भी हिला दिया। शरीर पर जबरदस्त पड़ने वाली बेंतों की मार भी चंद्रशेखर के ओंठो  मुस्कराहट और चेहरे पर चमचमाते देशभक्ति के तेज़ को न छीन सकी। हर बेंत पर वह ‘भारतमाता की जय’ और ‘वन्देमातरम’ का नारा लगाते रहे। यह सब देखकर वह जेलर झुंझला उठा और बोला- “किस मिटटी का बना है यह लड़का?” पास खड़े जेलर के अन्य अफसर और उपस्तिथ लोग भी चंद्रशेखर की इस सहनशक्ति को बहुत आश्चर्य के साथ देखते रहे।

15 बेंतों की सजा के पश्चात, जेल के नियमानुसार तीन आने पैसे, जेलर ने चंद्रशेखर को दिए, लेकिन चंद्रशेखर ने वह पैसे लेकर जेलर के मुँह पर ही फेंक दिए।  घावों पर जेल के डॉक्टर ने दवा लगा दी, फिर भी खून बहना बंद नहीं हुआ।  वह किसी तरह पैदल ही घिसटते हुए जेल से बाहर निकले, लेकिन अब तक चंद्रशेखर की वीरता की कहानी बनारस के घर-घर में पहुँच गई थी और जेल के दरवाज़े पर शहर की जनता फूल-मालाएँ लेकर उनका स्वागत करने के लिए पहुँच चुकी थी। सबने मालाएँ पहनाकर उनका स्वागत किया और उन्हें कन्धों पर उठा लिया।  इसके साथ ही इन नारो से आकाश गूंज उठा- ‘चंद्रशेखर आज़ाद की जय’ ; ‘भारतमाता की जय’ ; ‘महात्मा गांधी की जय’।

इसके अगले दिन बनारस से प्रकाशित होने वाले ‘मर्यादा’ नामक समाचारपत्र में लेख चंद्रशेखर आज़ाद की फोटो सहित ‘वीर बालक आज़ाद’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। उस समय इस समाचारपत्र के संपादक बाबू सम्पूर्णानंद जी थे, जो उस समय कांग्रेस के बड़े नेता तथा गांधी जी  अनुयायी थे।

इस तरह 15 बेंतों की सज़ा ने किशोर अवस्था में ही चंद्रशेखर को एक लोकप्रिय नेता के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। चंद्रशेखर को मिलने वाली सजा दर्दनाक व क्रूर अवश्य थी, लेकिन इस घटना के बाद उनकी भारतमाता के प्रति श्रद्धा और बलवती हुई, क्रांति की चिंगारियां उनके मन में धीरे-धीरे आग के रूप में परिवर्तित होने लगी।  आज़ादी का परवान उनके सिर पर चढ़ गया और अब उनके जीवन में केवल एक ही संकल्प शेष गया और वह था-देश को अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद कराना।

पंद्रह वर्ष की उम्र में घटी यह घटना उनके जीवन का वह महत्वपूर्ण अध्याय थी जिसके कारण वह चंद्रशेखर तिवारी से चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ बने और क्रांतिकारियों की श्रेणियों में गिने जाने लगे।  हष्ट-पुष्ट शरीर, दृढ़प्रतिज्ञ व स्थिर एकाग्र मन वाले चंद्रशेखर आज़ाद अनेकानेक युवाओं तथा भगत सिंह, सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने और अपने जीवन की आहुति देकर देश की स्वाधीनता का संकल्प पूर्ण कर गए।

आखिर में चंद्रशेखर आज़ाद का एक कथन-
” दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आज़ाद ही रहे है, आज़ाद ही रहेंगे”।

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