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चाणक्य जीवन गाथा (Chanakya Jivan Gatha)

Posted on February 21, 2016March 8, 2016 by Pankaj Goyal

Chanakya Jivan Gatha Part- 9

Chanakya Jivan Gatha

चाणक्य की कूटनीति के विचित्र रंग

अगले ही दिन चारो ओर यह बात फैला दी कि पर्वतेश्वर पौरवराज नदी में डूब गए। यह बात वे जितनी तेजी से फैलाना चाहते थे, उससे भी तेजी से फैली, परन्तु इससे भी तेजी से एक और समाचार फैला।

वह समाचार था फिलिप्स हत्या का। चाणक्य को पता चला कि फिलिप्स की हत्या से सब स्थानो पर भारी उथल-पुथल मच गई है। यवन सैनिक दौड़ते फिर रहे है। उनका कहना था कि हत्या एक ऐसे व्यक्ति ने की है, जो बहरूपिया बनकर वहां आया था तथा सम्राट के लिए शिकारी कुत्ते लाया था। लाख प्रयास करने के बाद भी हत्यारा पकड़ा नहीं जा रहा था।

इस समाचार को सुनकर चाणक्य फुले न समाए। वे चंद्रगुप्त के लौटने की प्रतीक्षा करने लगे। आशा से कहीं शीघ्र चंद्रगुप्त लौटे तो उनके चेहरे पर ही ‘विजय’ शब्द लिखा दिखाई दे रहा था। आते ही उन्होंने आचार्य के चरण-स्पर्श किए तथा एक सफल योजना बनाने के लिए उन्हें बधाई दी।

“कोई बाधा तो नहीं आई ?” चाणक्य ने पूछा।

“गुरुदेव द्वारा बनाई गई योजना में बाधा आ ही कैसे सकती है। आपकी योजना पर चलकर विजय प्राप्त करने में न मुझे पहले ही कोई संदेह था और न ही बाद में।”

“तुमने एक बहुत बड़ी बाजी जीत ली है चंद्रगुप्त। अब तुम देखना कि किस प्रकार तुम सफलता के निकट पहुंचते हो।”

“बाजी तो सदा की भांति आपने ही जीती है गुरुदेव ! आपके शिष्य ने तो केवल आपकी आज्ञा का पालन किया है। जहां तक सफलता के निकट पहुंचने की बात है, वहां भी आप ही पहुचेंगे। चंद्रगुप्त तो सफलता का मात्र एक जरिया होगा।”

“मैं जो कुछ भी कर रहा हूं, अपने देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए कर रहा हूं। अपने प्रिय शिष्य के उज्ज्वल भविष्य के लिए कर हूं। अभी बहुत कुछ करना शेष है वत्स ! अभी बहुत परिश्रम की आवश्यकता है।”

“परिश्रम के बारे में गुरुदेव सबसे आगे है। मैं जानता हूं कि मेरे गुरुदेव संसार का असम्भव-से-असम्भव कार्य भी कर सकते है। होगा वही जो गुरुदेव चाहेंगे। पता नहीं क्यों, मैं आपके बारे में एक भी शब्द गलत नहीं सोच सकता। एक भी शब्द गलत नहीं सुन सकता और एक भी शब्द गलत नहीं बोल सकता।”

“गुरु-भक्ति इसी को कहते है। अपने गुरु में अपार श्रद्धा रखना, अपने गुरु पर अटूट विश्वास करना तथा गुरु पर संदेह न करना ही गुरु-भक्ति है। मैं भी ऐसा ही करता था। गुरु-भक्ति ने ही मुझे किसी योग्य बनाया है। यदि आज मैं कुछ कर पा रहा हूं तो यह गुरु-भक्ति की ही देन है। मेरे गुरुजनो ने मुझे बहुत कुछ दिया है चन्द्रगुप्त। सच पूछो तो बहुत भाग्यशाली रहा हूं मैं।

मैं केवल गुरु होने का कर्तव्य पूरा कर रहा हूं। तुम्हे नहीं पता, मेरे गुरुजन सदा यहीं चाहते थे की मैं जीवन के हर क्षेत्र उनसे भी ऊंचा उठ जाऊं। मेरी भी यही इच्छा है कि तुम जीवन के हर क्षेत्र में मुझसे भी कई गुना ऊपर उठ जाओ। तुम्हारे ऊंचा उठने में ही मेरा गौरव है।”

चंद्रगुप्त के नेत्र सजल हो गए। अपने गुरु के प्रति उनके ह्रदय में जो श्रद्धा थी, वह और बढ़ गई।

तभी अचानक उन्हें कुछ याद आया। उन्होंने पूछा___”पौरवराज नदी में कैसे डूब गया गुरुदेव ?”

” क्या तुमने यह समाचार सुन लिया ?”चाणक्य ने पूछा।

“हां गुरुदेव ! परन्तु मुझे विश्वास नहीं हो रहा इस समाचार पर। मैं आपसे जानना चाहता हूं कि सच क्या है ?”

चाणक्य ने सच बताया। सुनकर चंद्रगुप्त गहरी सोच में पड़ गए।

“पर्वतेश्वर ने जो पाप किया, उसकी सजा उसे मिल गई।” चाणक्य बोले___”मिलनी भी चाहिए थी।”

“परन्तु गुरुदेव।” चन्द्रगुप्त बोला___”क्या इससे हमारा एक मित्र कम नहीं हो गया।”

“मित्र वह होता है चंद्रगुप्त जो, मित्रता पर कभी धब्बा न लगने दे। पर्वतेश्वर को मित्र समझने की भूल न करो। ऐसे मित्र से तो शत्रु अच्छा होता है।”

” क्या उसकी मृत्यु से हमारी भविष्य की योजनाओ पर प्रभाव नहीं पड़ेगा ?”

“हमारी योजनाए किसी व्यक्ति-विशेष पर निर्भर नहीं है चंद्रगुप्त। न ही हमे किसी पर निर्भर रहना है। हमे तो वह प्रयास है, जिससे दूसरे हम पर निर्भर हो जाएं।”

“जी गुरुदेव।”

“अब आगे की योजना सुनों ! फिलिप्स व पर्वतेश्वर की मृत्यु के बाद देश की स्थिति बहुत बदल गई है। हमे इसी बदली हुई स्थिति का लाभ उठाना है।”

इसके बाद चाणक्य विस्तारपूर्वक चंद्रगुप्त को अपनी योजना समझाने लगे।

चाणक्य और राक्षस की बौद्धिक जंग

राक्षस को अपने गुप्तचरों द्वारा सुचना मिली कि देशद्रोही सेनापति पुष्पगुप्त अपनी बहन सहित घोड़े पर सवार होकर मगध की ओर आ रहा है तथा एक पहाड़ी राजा अपनी सेना सहित उसका पीछा कर रहा है।

“इस ओर आने वाला कोई भी हो।” राक्षस ने आदेश दिया___”उसे बंदी बना लिया जाए।”

फिर मगध की सीमा में प्रवेश करते ही पुष्पगुप्त तथा उसकी बहन को बंदी बना लिया गया। दूसरी ओर राक्षस ने अपनी सेना को साथ लिया तथा मलयकेतु का रास्ता रोक लिया।

“मेरा रास्ता मत रोको।” मलयकेतु बोला___”मैं अपने अपराधी को पकड़ने निकला हूं तथा उसे पकड़कर ही जाऊंगा।”

“यह मगध की सीमा है।” राक्षस ने कहा___”इस सीमा से आगे बढ़कर किसी अपराधी को भी नहीं पकड़ा जा सकता। अच्छा यहीं होगा कि तुम लौट जाओ।”

“तुम शायद मुझे नहीं जानते।” मलयकेतु बोला___”मैं पर्वतेश्वर का उत्तराधिकारी हूं। यदि तुमने मुझे यहां रोका तो युद्ध शुरू हो जाएगा। अब बोलो, क्या तुम युद्ध चाहते हो ?”

राक्षस ने अपनी बुद्धि पर जोर दिया। यह तो निश्चित था कि युद्ध होने पर वह पर्वतीय राजा वहां से जीत कर नहीं जा सकता था, परन्तु एक साधारण से अपराधी के लिए युद्ध करना उचित नहीं था। वह भी तब, जब उसके गुप्तचरो ने उसे सुचना दी थी कि चंद्रगुप्त मगध पर आक्रमण करने वाला है।

‘क्यों न इस राजा को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया जाए।’ उसने सोचा___’ताकि चंद्रगुप्त से युद्ध होने पर उसे पर्वत क्षेत्र की सेनाओ का सहयोग भी मिल सके।’

ऐसा सोचकर उसने मलयकेतु से कहा___”व्यर्थ में रक्तपात करने से कोई लाभ नहीं है महाराज। आइये बातचीत द्वारा इस विवाद को सुलझा लेते है।”

“मैं बातचीत नहीं करना चाहता।” मलयकेतु बोला।

“महाराज। बातचीत करने से कभी हानि नहीं हुआ करती। इतना तो आप भी जानते है। हो सकता है, बातचीत से हम दोनों को कोई अतिरिक्त लाभ ही हो जाए।”

मलयकेतु घोड़े से उतरकर राक्षस के साथ चल पड़ा। राक्षस ने उसे शाही अतिथिशाला में ठहराया तथा सेवको को आदेश दिया___”महाराज की सेवा में कोई कमी न रहने पाए।”

एक और महाभारत का प्रारम्भ

चाणक्य ने युद्ध की सारी तैयारियां पूरी कर ली। इसके बाद उन्होंने मगध की सेना को युद्ध के लिए ललकारा। मगध की विशाल गज सेना इसके लिए पहले ही तैयार थी। देखते-ही-देखते मगध के दुर्ग के सारे द्वार खोल दिए गए। विशाल गज सेना पर सवार होकर बड़े-बड़े शूरवीर आगे-आगे चले तथा उनके पीछे दूसरी विशाल सेनाएं चल दी। इस युद्ध में चाणक्य ने मलयकेतु तथा उसकी सेना को आगे रखा, ताकि वह पीछे से वार न कर सके। मलयकेतु बहुत बौखलाया, परन्तु वह मना न कर सका। उसे राक्षस के साथ हुआ समझौता तोडना पड़ा।

एक विचित्र युद्ध

चाणक्य ने पूरा प्रबंध कर रखा था। चन्द्रगुप्त के आदेश पर सभी सैनिकों ने शत्रु पक्ष के सैनिकों की बजाय हाथियों पर तीर चलाने प्रारम्भ कर दिए, जिससे हाथी क्रुद्ध हो उठे। वे तेजी से सामने की ओर दौड़े, परन्तु चाणक्य ने पहले ही उचित स्थानो पर छोटे-छोटे दुर्ग बनवा दिए थे। सैनिक उन दुर्गो में जा छिपे।

क्रुद्ध हाथियों ने दुर्ग की दीवारो से अपने सिर फोड़ने शुरू कर दिए, परन्तु वे दुर्ग इतने कठोर थे कि हाथियों से हिले भी नहीं। इसके विपरीत दुर्ग की दीवारो पर लगी अनगिनत कीलों ने हाथियों के मस्तक खून से लथपथ कर दिए।

अब हाथी पलटे तथा अपने ही सैनिकों की और दौड़ पड़े। उन्होंने अपने सवारों को भूमि पर पटक दिया तथा पीछे आ रही सेना को कुचलना शुरू कर दिया। मगध की सेना में हा-हाकार मच गया। वहां की सेना के बहुत से सैनिक हाथियों ने कुचल-कुचल कर मार डाले। अधिकांश सेना को समाप्त करके वे क्रोधित हाथी कुछ ही देर बाद दुर्ग के दूसरी और भागे। चाणक्य ने वहां पूरे मैदान में गड्डे खुदवा रखे थे। सारे हाथी उन गड्डो में फंस-फंसकर दम तोड़ने लगे। सेनापति भद्रसाल ने बचे हुए सैनिको को लौटने के लिए कहा।
“वाह गुरुदेव। आपने तो चमत्कार कर दिया। मगध की सारी गज सेना ही नष्ट कर डाली। शत्रुओं की पहली भिड़ंत का मुंहतोड़ उत्तर दिया आपने। हमारा एक भी सैनिक नहीं मरा और शत्रुओं की सेना का एक बड़ा हिस्सा समाप्त हो गया।”

“शेष सेना भी हमारा मुकाबला नहीं कर पाएगी।” चाणक्य बोले___”तुम देखना, शत्रु को हमारे सामने घुटने टेकने ही होंगे।”

<——Part 8                                         Part- 10—–>

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