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कानपुर का गंगा मेला – स्वतंत्रता संग्राम से जुडी है इसकी कहानी

Posted on March 21, 2017March 21, 2017 by Pankaj Goyal

पुरे भारत में होली सामान्य तौर पर एक दिन खेली जाती है, लेकिन यूपी के कानपुर में लोग होली के दिन रंग खेले ना खेले मगर अनुराधा नक्षत्र के दिन होली जरूर खेलते है।

इसके पीछे एक तर्क है जो आजादी के पहले से चला आ रहा है। कहते है जब भारत गुलामी की जंजीरो से आजाद होने के लिए संघर्ष कर रहा था, तब कानपुर में आजादी के दीवाने क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुक्मरानों के मना करने के बावजूद होली के दिन ना केवल जमकर होली खेला था, बल्कि हटिया बाज़ार के पार्क में तिरंगा भी लहरा दिया था। जानकार बताते है कि इस हरकत पर गोरे सैनिको ने करीब चालीस क्रांतिकारी युवाओं को होली के दिन ही गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था। जिसे छुड़ाने के लिए कनपुरियों ने जो संघर्ष किया उससे अंग्रेजी हुक्मरानों की नींव हिल गयी थी।

यह भी पढ़े – काशी के महाश्मशान पर जलती चिताओ के बीच चिता भस्म से खेली जाती है होली

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ये है गंगा मेला की कहानी

हटिया गंगा मेला की नींव साल 1942 में पड़ी थी। जब इस मोहल्ले में होली के दिन हटिया बाजार रज्जन बाबू पार्क में नौजवान क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत की परवाह किए बगैर पहले तिरंगा फहराया, फिर जमकर होली खेली। इसकी भनक अंग्रेजी हुक्मरानों को लग गई। जिसके बाद करीब एक दर्जन से भी ज्यादा अंग्रेज सिपाही घोड़े पर सवार होकर आए। झंडा उतारने लगे जिसको लेकर होली खेल रहें नौजवानों के बीच संघर्ष भी हुआ।

अंग्रेज हुक्मरानों ने क्रांतिकारी नौजवान स्व गुलाब चन्द्र सेठ, बुद्धूलाल मेहरोत्रा, नवीन शर्मा, विश्वनाथ टंडन, हमीद खान, गिरिधर शर्मा सहित करीब पैंतालीस लोगों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया।

क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करना अंग्रेजी हुक्मरानों के लिए गले की हड्डी बन गई। गिरफ्तारी के विरोध में कानपुर का पूरा बाजार बंद हो गया। मजदूर, साहित्यकार, व्यापारी और आम जनता ने जहां अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। वही इनके समर्थन में समूचा कानपुर शहर और आसपास के ग्रामीण इलाको का भी बाज़ार बंद हो गया।

मजदूरों ने फैक्ट्री में काम करने से मना कर दिया। ट्रांस्पोटरों ने चक्का जाम कर सड़कों पर ट्रकों को खड़ा कर दिया। सरकारी कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। हटिया बाजार में मौजूद उस मोहल्ले के सौ से ज्यादा घरों में चूल्हा जलना बंद हो गया। मोहल्ले की महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे उसी पार्क में धरने पर बैठ गए।

पूरी शहर की जनता ने अपने चेहरे से रंग नहीं उतारे, यूं ही लोग घूमते रहे। शहर के लोग दिनभर हटिया बाजार में ही इक्कठा हो जाते और पांच बजे के बाद ही लोग अपने घरों में वापस चले जाते। इस आंदोलन की आंच दो दिन में ही दिल्ली तक पहुंच गई। जिसके बाद पंडित नेहरू और गांधी जी ने इनके आंदोलन का समर्थन कर दिया।

कानपुर शहर में मीले बंद, कोई कारोबार नहीं होने से अंग्रेजी हुक्मरान परेशान हो गया। बात सात समंदर पर तक पहुंची, चौथे ही दिन अंग्रेज का एक बड़ा अफसर कानपुर पहुंचा। शहर के कुछ प्रतिष्ठित लोगों को बात करने के लिए बुलाया। लोगों ने उसे हटिया बाज़ार के पार्क में आकर बात करने को कहा तो उसने मना कर दिया। कहते है आखिर कर उस अंग्रेज अफसर को उस पार्क में आना पड़ा, जहां करीब चार घंटे तक बातचीत चली। उसके बाद सभी क्रांतिकारियों को होली के पांचवे दिन अनुराधा नक्षत्र के दिन रिहा कर दिया गया।

कहते है अनुराधा नक्षत्र के दिन जब नौजवानों को जेल से रिहा किया जा रहा था। पूरा शहर उनके लेने के लिए जेल के बाहर इकठ्ठा हो गया थे। जेल से रिहा हुए क्रांतिवीरों के चहरे पर रंग लगे हुए थे।जेल से रिहा होने के बाद जुलुस पूरा शहर घूमते हुए हटिया बाज़ार में आकर खत्म हुआ। उसके बाद क्रांतिवीरों के रिहाई को लेकर यहां जमकर होली खेली गई।

तब से चली आ रही इस परम्परा को हर साल निभाया जाता है। गंगा मेला के दिन यहां भीषण होली होती है। ठेले पर यहां होली का जुलुस निकाला जाता है। ये जुलुस हटिया बाज़ार से शुरू होकर नयागंज, चौक सर्राफा, सहित कानपुर के करीब एक दर्जन पुराने मोहल्ले में धूमता हुआ दोपहर दो बजे तक हटिया के रज्जन बाबू पार्क में आ कर खत्म किया जाता है।

इसके बाद शाम को सरसैया घाट पर गंगा मेला का आयोजन किया जाता है। जहां शहर भर के लोग इकठ्ठा होते है और एक दूसरे को होली की बधाई भी देते है।

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1 thought on “कानपुर का गंगा मेला – स्वतंत्रता संग्राम से जुडी है इसकी कहानी”

  1. Shabdbeej says:
    July 12, 2017 at 4:28 am

    काश ! आज के समय भी लोगों में इतनी एकता और भाईचारा देखने को मिले.
    Nice post

    Reply

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