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Bodh Bhikshu In Hindi

बौद्ध भिक्षु बनने के नियम

Posted on April 29, 2018May 1, 2018 by Pankaj Goyal

Bodh Bhikshu | बौद्ध भिक्षु | हर धर्म की तरह दो जीवन शैलियां तय कीं। एक सामान्य गृहस्थी और दूसरा संन्यास। बौद्ध धर्म में बौद्ध भिक्षु बनने की पूरी प्रोसेस को इस तरह कठिन बनाया गया है कि हर कोई उसे फॉलो नहीं कर सकता। सिर्फ जो पूरे मन से धर्म प्रचार में लगना चाहता है वो ही इसको फॉलो कर सकता है। बौद्ध धर्म और वैदिक सनातन धर्म में कई समानताएं हैं लेकिन बौद्ध धर्म में वैदिक यज्ञ परंपरा को पूरी तरह नकारा है। बौद्ध धर्म में ज्योतिष और तंत्र को हिंदु धर्म की तरह ही मान्यता मिली है।

Bodh Bhikshu In Hindi

गौतम बुद्ध ने बौद्ध भिक्षुओं के लिए कुछ नियम तय किए थे जिनका मिला-जुला रुप ये था कि बौद्ध भिक्षु का जीवन पूरी तरह त्याग, वैराग्य और समाधि के आसपास ही रहेगा।

ये हैं बौद्ध भिक्षु बनने के कुछ सामान्य नियमः

उम्र – आमतौर पर किशोरावस्था में कोई व्यक्ति बौद्ध धर्म में भिक्षु का जीवन अपना सकता है। अगर माता-पिता और परिजनों की सहमति हो तो कम उम्र में भी दीक्षा दी जा सकती है। लेकिन, किसी भी आयु में बौद्ध भिक्षु बनने के लिए परिवार की सहमति बहुत जरुरी होती है।

दीक्षा – बौद्ध भिक्षु बिना दीक्षा के नहीं बन सकते। किसी बौद्ध गुरु से विधिवत दीक्षा के बाद सांसारिक रिश्तों और जीवन का त्याग करके ही बौद्ध भिक्षु बना जा सकता है।

महिलाएं – हालांकि शुरुआती दौर में गौतम बुद्ध बौद्ध मठों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर तैयार नहीं थे। ये केवल पुरुषों के लिए था लेकिन समय बीतने के साथ महिलाओं को भी मठों में दीक्षा की अनुमति मिल गई।

भिक्षा से भरण-पोषण – बौद्ध भिक्षुओं का भोजन भिक्षा पर ही निर्भर रहता है। कई जगहों पर बौद्ध भिक्षुओं को कोई भी वस्तु खरीदने पर भी पाबंदी है, वे उन्हीं चीजों का उपयोग कर सकते हैं जो उन्हें दान में मिली हों।

भोजन – कई जगह बौद्ध भिक्षुओं के लिए नियम हैं कि वो केवल सुबह के समय एक बार ठोस आहार ले सकते हैं, दोपहर से अगले दिन की सुबह तक उन्हें लिक्विड डाइट पर ही रहना होता है।

कपड़े – बौद्ध भिक्षुओं के लिए तीन कपड़े रखना ही नियम है। दो शरीर पर लपेटने के लिए और एक चादर। ये तीन कपड़े भी किसी के त्यागे हुए या दान किए हों, बौद्ध भिक्षु खुद नहीं खरीद सकते।

ध्यान और समाधि – बौद्ध भिक्षुओं का सबसे बड़ा नियम होता है ध्यान। उन्हें अपनी साधना और समाधि की स्थिति को किसी भी अवस्था में नहीं छोड़ना होता है। ध्यान के जरिए कुंडलिनी जागरण ही उनका सबसे बड़ा उद्देश्य होता है।

परम अवस्था – ध्यान के जरिए समाधि की प्राप्ति, स्वाध्याय और कुंडलिनी जागरण के जरिए परम अवस्था को प्राप्त करना ही उनका ध्येय होता है।

ध्यान का स्थान – बौद्ध भिक्षुओं के प्रशिक्षण काल में उन्हें अलग-अलग वातावरण में भी ध्यान करने का प्रशिक्षण मिलता है। बहुत ठंडे या बहुत गर्म जगह, बहुत सुनसान या बहुत भीड़ वाली जगह। ऐसे अलग-अलग स्थान पर भी वो अपनी ध्यान की अवस्था का प्रशिक्षण लेते हैं।

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