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कहानी ‘चाणक्य’ की पार्ट-4 (Kahani ‘Chanakya’ ki in Hindi Part- 4)

Posted on December 2, 2015March 8, 2016 by Pankaj Goyal

Kahani Chanakya ki in Hindi Part-4
Kahani ‘Chanakya’ ki in Hindi Part- 4

अंतिम संस्कार

आंधी-तूफान की चिंता किए बिना कौटिल्य दौड़ता-दौड़ता एक अज्ञात स्थान पर जा पहुंचा। पास ही गंगा बह रही थी। एक पेड़ के नीचे खड़े होकर कौटिल्य बिलख-बिलखकर रोने लगा। वह अपने पिता का केवल सिर ही प्राप्त कर सका था। पूरी देह नहीं,परन्तु माँ का तो कुछ भी नहीं प्राप्त कर सका था।

पता नहीं, माँ का देहांत कब हुआ था ? उसका अंतिम संस्कार किया जा चूका था या नहीं ? उसकी देह को कहीं राज्यकर्मी ही न ले गए हो।

कितना अभागा वह था। माँ-बाप को कितना गर्व था उस पर। कितनी आशाएं थी उससे, परन्तु सब धूल में मिल गई। वह उनकी कोई सेवा न कर सका। वह सेवा भी न कर सका जिसके लिए हर माँ-बाप पुत्र की कामना करते है। अंतिम संस्कार की सेवा, जो पुत्र का एक प्रमुख कर्तव्य भी होता है।

वर्षा अभी भी हो रही थी। वह चाहता था शीघ्रातिशीघ्र अपने पिता के सिर का अंतिम संस्कार कर दे। यदि राज्यकर्मियों ने उसे ढूंढ लिया तो वह इतना भी नहीं कर सकेगा। अंतिम संस्कार करने में सबसे अधिक कठिनाई थी सुखी लकड़ियाँ प्राप्त करने की। एक ऐसे स्थान की खोज करने की, जहां चिता जलाई जा सके।

पिता का सिर हाथ में उठाएं वह ऐसे ही किसी स्थान को खोजने लगा। ऐसा स्थान उसे बड़ी कठिनाई से मिला। वह स्थान एक पुराना श्मशान घाट था, जिसका प्रयोग तब नहीं होता था। वहां से उसे कुछ सुखी लकडिया तथा थोड़ा सा घास-फूस उपलब्ध हो गया।

उसने एक चिता तैयार की। चिता पर पिता का सर स्थापित किया। पत्थरों को घिसकर बड़े परिश्रम से अग्नि प्रकट की, फिर चिता को मुखाग्नि देते हुए उन श्लोको का उच्चारण किया, जो उसके पिता ने उसे सिखाये थे। छोटी सी चिता धूं-धूं करके जल उठी। कुछ ही समय बाद वहां रह गया राख का एक ढेर। उसने राख को एकत्रित किया। वहां उपेक्षित सी पड़ी एक मिटटी की हांड़ी में उसे भरा, फिर वहीं एक गड्डा खोदकर उसे दबा दिया।

26

मैं प्रतिज्ञा करता हूं

सारा कार्य पूरा करने के पश्चात कौटिल्य ने अपने आंसू पौंछ डाले। उसने क्रमशः पृथ्वी और आकाश को देखा, फिर दृढ़ स्वर में बोला ___”आकाश देवता और धरती माँ ! मैं आपके सामने प्रतिज्ञा करता हूं, जब तक अत्याचारि नन्द से अपने जन्मदाता की हत्या का प्रतिशोध नहीं ले लेता, तब तक में अग्नि के सम्पर्क में आया कोई भोजन न खाऊंगा, न ही अपने पिता की राख व अस्थियों को गंगा की गोद में प्रवाहित करुंगा।

तुम दोनों मुझे आशीर्वाद दो। प्रकृति की मौन शक्तियों ! मुझे बल दो। हे यमराज ! उस अत्याचारी स्वार्थसिद्धि का नाम अपने लेखे से काट दे। उसकी मृत्यु में हूं। मैं ! आज से मैं कौटिल्य नहीं, चणक का पुत्र चाणक्य हूं। कौटिल्य मर चुका ! अपने मात-पिता की मृत्यु के साथ ही कौटिल्य मर चूका !”लेकिन…! उसकी आत्मा ने उसे झिंझोड़ा _____’क्या तू यह प्रतिज्ञा पूरी कर पायेगा ? राज्य कर्मचारी तुझे शिकारी कुत्तों की तरह खोज रहे होंगे। यदि उन्होंने तुझे ढूंढ लिया तो तेरा सिर भी काटकर चौराहे पर टांग दिया जायेगा। ‘

‘तो तुझे क्या करना चाहिए ?’ चाणक्य बड़बड़ाया।

‘सबसे पहले तुझे स्वयं को बदलना होगा। अपना चेहरा बदलना होगा। अपना शेष शरीर भी बदलना होगा। तेरी सुरक्षा के लिए यह नितांत आवश्यक है। तू स्वयं को बदल डाल। फिर युद्ध की शिक्षा ले।फिर राजनीति की शिक्षा ले। कूटनीति का ज्ञान प्राप्त कर, तभी तेरी प्रतिज्ञा पूरी होगी। ‘

‘हां!’ चाणक्य मन-ही-मन बोला____’मैं यही करूंगा। मैं स्वयं को ऐसा बदल डालूंगा कि कोई मुझे पहचान ही नहीं पायेगा।’

तब चाणक्य ने स्वयं को बदलने के लिए कोई उपाय सोचना शुरू कर दिया।

आचार्य राधामोहन की शरण में

प्रातः की वेला हो गई। आकाश में सिंदूरी आभा दिखाई देने लगी। लोग नित्यकर्म से निवृत होकर गंगा तट पर जाकर स्नान करने लगे। उन्हीं लोगो में एक थे आचार्य राधामोहन स्वामी।

स्नान करने के बाद स्वामीजी ने गंगाजल की अंजलि अर्पित की। सूर्य को अर्घ्य दिया तथा उसकी उपासना की। इसके बाद वे नित्य की भातिं की ओर चल दिए। प्रभु नाम का उच्चारण करते हुए वे अपनी ही धुन में चले जा रहे थे कि एकाएक उनका पैर कहि टकराया। उन्होंने सिर झुका कर देखा तो आश्चर्य में डूब गए। उनके सामने एक जले हुए शरीर वाला बालक बेसुध पड़ा था।

‘अरे ! यह बालक कौन है ?’ वे चौंककर बोले___’लगता है, यह किसी दुर्घटना का शिकार हो गया है।’ इसके बाद बालक के निकट जा बैठे तथा उसे होश में लाने का प्रयत्न करने लगे। बहुत देर बाद चाणक्य को होश आया। अपने सम्मुख एक ब्राह्मण को देखकर वह चौंककर उठ बैठा तथा इधर-उधर देखने लगा।
“चिंता न करो बालक !” स्वामीजी बोले___”अपना परिचय दो और यह भी बताओ कि तुम्हारी यह दशा कैसे हो गई ?”

“आप कौन है ?” चाणक्य ने पूछा।

“मैं राधामोहन स्वामी हूं। गांव के विद्यालय में शिक्षक हूं। अकेला रहता हूं। जहां इस समय तुम बैठे हो, यह मेरा छोटा सा खेत है। यहां मैं अपना पेट भरने के लिए थोड़ा अन्न उगा लेता हूं। गांव के बालको को शिक्षा देता हूं तथा ईश्वर भक्ति में लीन रहने का प्रयास करता हूं। अब तुम अपना परिचय दो।”

“मैं एक अनाथ बालक हूं आचार्य जी !” चाणक्य बोला___”संसार में मेरा कोई नहीं है। कोई निश्चित निवास भी नहीं है। कभी यहां, तो कभी वहां भटकता फिर रहा हूं।”

“तुम्हारा शरीर कैसे जल गया ?”

“भोजन बना रहा था। अचानक कपड़ों ने आग पकड़ ली। उसी से मेरा यह हाल हो गया। सोचा था, गंगा में कूदकर अपने प्राण दे दूं, परन्तु यह मुझसे नहीं हो सका।”

“आत्महत्या पाप है पुत्र।” स्वामीजी शांत स्वभाव से बोले___”वैसे भी यह कायर व्यक्तियों का काम है। तुम तो मुझे बहादुर बालक लगते हो।”

“ऐसे अनाथ जीवन का लाभ ही क्या आचार्य जी ?”

“जो अनाथ होता है, उसका नाथ ईश्वर होता है। तुम स्वयं को अनाथ मत समझो। ईश्वर को अपना बनाओ। वह बहुत दयालु है। बड़ा कृपालु है।”

“मुझे इस समय आप में ही ईश्वर के दर्शन हो रहे है। आपने इतने अपनत्व से बात की। मेरे मन का सारा क्लेश दूर हो गया।”

” तो फिर उठो। मेरे साथ चलो।”

“कहां आचार्य जी ?”

“पाठशाला ही मेरा निवास स्थान है। वहां चलकर विश्राम करो। स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करो। जब पूरी तरह स्वस्थ हो जाओ तो जहां इच्छा हो, वहां चले जाना।”

“आप पूजनीय है। आदरणीय है। मैं आपकी आज्ञा अवश्य मानूंगा।” कहकर चाणक्य उठ खड़ा हुआ।

“तुमने अपना नाम तो अभी तक बताया ही नहीं। क्या नाम है तुम्हारा ?” स्वामीजी ने शांत स्वर में पूछा।

“विष्णुगुप्त।”

स्वामीजी चाणक्य को लेकर पाठशाला की ओर चल पड़े।

तक्षशिला में नए जीवन का श्री गणेश

राधामोहन स्वामी ने चाणक्य को आचार्य पुण्डरीकाक्ष के नाम एक पत्र लिखकर दिया, फिर पाठशाला के छात्रों तथा गुरु से अश्रुपूर्ण विदाई लेकर चाणक्य ने तक्षशिला की ओर प्रस्थान किया। इस प्रकार श्रीगणेश हुआ एक नई यात्रा का। अब वह बालक कौटिल्य नहीं था। विष्णुगुप्त चाणक्य नाम का एक पूर्ण स्वस्थ युवक बन चुका था। अब उसके शरीर में तेज गति थी। ह्रदय में धधकती हुई प्रतिशोध की आग थी। भावनाओं को अपने में समाहित कर जाने का अदम्य उत्साह था। उसने तक्षशिला की ओर जो यात्रा प्रारम्भ की थी,वह लगातार चलती रही। उसने कई नगर, गाँव तथा प्रदेश पीछे छोड़ दिए। उसके कदमो में तनिक भी शिथिलता नहीं आयी। पूरा एक दिन चलने के बाद चाणक्य ने एक सार्वजनिक अतिथिशाला में विश्राम किया। विश्राम करते समय उसके मन में विचार आया ____’मुर्ख !यह तू क्या कर रहा है ? यूं विश्राम करने लगा तो लक्ष्य दूर हो जायेगा। तू एक अविराम पथिक बन। तेरा काम रुकना नहीं, लगातार आगे बढ़ना है। अपने लक्ष्य को शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त करना है।’

यह विचार मन में आते ही चाणक्य उठ खड़ा हुआ। उसने अपना सामान कंधे पर लादा और रात्रि के घोर अंधकार में वहां से चल पड़ा।

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Kahani Chanakya ki in Hindi Part-4

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1 thought on “कहानी ‘चाणक्य’ की पार्ट-4 (Kahani ‘Chanakya’ ki in Hindi Part- 4)”

  1. धीरेन्द्र कुमार says:
    February 3, 2016 at 2:09 pm

    बहुत खूब

    Reply

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