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Chanakya Story Part-5 (चाणक्य स्टोरी पार्ट-5)

Posted on January 27, 2016March 8, 2016 by Pankaj Goyal

Chanakya Story
Chanakya Story Part-5
गांधार में प्रवेश

चलते-चलते चाणक्य ने गांधार प्रान्त में प्रवेश पा ही लिया। वहां पहुंचते ही उसका चेहरा खिल उठा। बहुत चर्चा सुनी थी उसने गांधार की। वहां की सभ्यता तथा भव्यता की। पुरातनता तथा विशाल भवनों की। सचमुच वहां के नागरिक तथा भवन अलग ही प्रतीत हो रहे थे।

वहां सचमुच सभ्यता व भव्यता दिखाई दे रही थी। उसने गांधार के बारे में जैसा सुना था, वैसा ही पाया।

थके हारे विष्णुदत्त ने एक धर्मशाला में प्रवेश किया। वहां उसने पहले स्नान करके अपने तन की थकान मिटाई, फिर पूजा-पाठ करके आत्मा की भूख मिटाई, फिर अंत में भोजन करके जठराग्नि को शांत किया।

रात्रि को विश्राम करके वह प्रभात बेला में उठ बैठा। उसने तक्षशिला का पता पूछा, अपना सामान कंधे पर लादा तथा वहां से अपने गंतव्य स्थान की ओर चल पड़ा।

उस समय उसके हर्ष का कोई पारावार न था। वह उस स्थान के निकट पहुंच चुका था जहां देश-विदेश से बड़े-बड़े विद्वान शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे।

जहां राजनीति,अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र, इतिहास व ज्ञान-विज्ञानं की पूर्ण शिक्षा दी जाती थी।

नंद वंश का विस्तार यूं हुआ

कुछ समय पश्चात महारानी सुनंदा ने किसी संतान के स्थान पर एक मांस पिंड को जन्म दिया।

महाराज के आदेश पर राक्षस को बुलाया गया तथा वह मांस पिंड दिखाया गया। राक्षस ने ध्यानपूर्वक मांस पिंड को देखा, फिर अपनी तलवार से नौ टुकड़े कर दिए। प्रत्येक टुकड़े को उसने अलग-अलग जल से भरे जारों में रखवा दिया।

कुछ ही समय पश्चात उन मांस पिंडो ने आकार धारण कर लिया। तब राक्षस ने उन्हें दूसरे उचित स्थान पर रखवा दिया। समय पाकर वे नौ बालक बन गए।

“बधाई हो महाराज !” एक दिन राक्षस महाराज से बोला___”अब आप स्वस्थ नौ पुत्रों के पिता बन चुके है।”

“सबसे अधिक बधाई तुम्हे हो राक्षस !” महाराज प्रसन्नतापूर्वक बोले___”यदि तुम अपनी विद्या द्वारा उस मांस पिंड का उचित उपचार न करते तो हम इन नौ पुत्रों के पिता नहीं बन सकते थे। हमे तुम पर गर्व है राक्षस। तुम मेरे लिए इस संसार की सबसे अमूल्य निधि हो। अब सुनो, मैं तुम्हे एक शुभ समाचार और सुनाता हूं।”

“सुनाइए महाराज।”

“रानी मुरा भी इस समय गर्भवती है।”

मुरा का नाम सुनकर राक्षस के मन में कड़वाहट-सी भर गई, फिर भी वह मुस्कुराते हुए बोला___”बधाई हो महाराज ! आपके वंश का यूं तेजी से विस्तार होता देख मैं बहुत खुश हूं।”

“हम जानते है।” महाराज बोले___”तुम्हे हम से भी अधिक प्रसन्नता हुई होगी। अब हम तुमसे एक प्रार्थना करना चाहेंगे।”

“प्रार्थना नहीं महाराज, आज्ञा दीजिये। मैं आपकी प्रत्येक आज्ञा का पालन करूंगा।”

“किसका जीवन कितना लम्बा है, राक्षस, यह कोई नहीं जानता।” महाराज गंभीर होकर बोले___”मृत्यु कभी भी किसी को अपना शिकार बना सकती है। हम चाहते है, यदि हमे मृत्यु अपना ग्रास बना ले तो तुम हमारे वंश की रक्षा करो।”

“यह आप क्या कह रहे है महाराज ! ईश्वर मेरी आयु भी आपको दे दे।”

“हम तुम्हारी भावनाओं का सम्मान करते है, परन्तु सच्चाई तो सच्चाई ही होती है राक्षस। यदि तुम हमे यह वचन दे सको तो हम निश्चिंत हो सकेंगे।”

“राक्षस का तो जन्म ही नंद वंश की सेवा के लिए हुआ है। फिर भी यदि मेरे वचन देने से आप निश्चिंत होते है तो मैँ आपको वचन देता हूं। जब तक मेरे शरीर में एक भी सांस शेष रहेगी, नंद वंश की रक्षा व सेवा करता रहूंगा।””शाबाश राक्षस !” महाराज निश्चिंत भाव से बोले___”अब हमे कोई चिंता नहीं।”

मुरा ने पुत्र को जन्म दिया

उचित समय पर रानी मुरा ने एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया। तब पुरे मगध को दुल्हन की तरह सजाया गया तथा खुशियां मनाई गई।

महल में तरह-तरह के आयोजन किये गए। महाराज की प्रसन्नता के लिए राक्षस ने हर प्रकार के प्रबंध किए।

इसके बाद सुनंदा के मांस पिंड से उत्पन्न नौ पुत्रों को नंद कहा जाने लगा तथा मुरा द्वारा उत्पन्न पुत्र को मौर्य।

चाणक्य ने अपना वचन पूरा किया

समय तेजी से बीतता रहा। कई बसंत आए। कई पतझड़ गए। चाणक्य पूरी निष्ठां व लग्न से अपने अध्याय में जुटे रहे।

कुछ समय में ही उन्होंने अपने आचार्यो व सहपाठियों की दृष्टी में अपना एक विशेष स्थान बना लिया।

यद्यपि आचार्य पुण्डरीकाक्ष चाणक्य से कोई सेवा नहीं चाहते थे, परन्तु चाणक्य उनकी फिर भी मन लगाकर सेवा किया करते थे।

उन्होंने उपनिषद, व्याकरण, गणित, दर्शनशास्त्र, ज्योतिष व रसायन-शास्त्र इत्यादि में पूर्ण पाण्डित्य प्राप्त कर लिया। वे बड़े-बड़े विद्वानो के साथ शास्त्रार्थ करने लगे और शास्त्रार्थ में उन्हें पराजित करने लगे।

पाटलिपुत्र में चाणक्य के कदम

जिस समय चाणक्य ने मगध की भूमि पर अपना कदम रखा, उस समय सूर्योदय होने को था। पूरी पृथ्वी प्रकाश से भर चुकी थी। पहले तो मन किया कि जाकर अपने बचपन की मित्र सुवासिनी को तलाश करे। अपने चाचा शकटार के दर्शन करे, परन्तु उन्हें उचित न लगा।उन्होंने अपने मन में विचार किया___’सबसे पहले मुझे राजा नन्द का नाश करना है। उससे अपने माता-पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेना है। अपने पिता की अस्थियो व राख को गंगा में प्रवाहित करना है। अपना संकल्प पूरा करके ही मैं किसी से मिलूंगा।’

ऐसा विचार करके चाणक्य ने राजधानी पाटलिपुत्र के बाहर अपनी एक झोपडी बना ली तथा वहां रहकर खोजबीन शुरू कर दी।

आस-पास के खेतों के किसान प्रायः उनसे मिलने आ जाया करते थे। बातों-बातों में चाणक्य उनसे सब कुछ जान गए।

वे जान गए कि महाराज ने सन्यास लेकर जंगल में रहना शुरू कर दिया है। राज्य की सत्ता नंद भाइयों ने संभाल रखी है। वे जान गए की महाराज नंद ने जंगल में अपना निवास स्थान कहां बना रखा है?

सारा पता लगाने के बाद उन्होंने अपने वस्त्रों में एक कटार छिपाई तथा अपना संकल्प पूरा करने हेतु जंगल की ओर चल पड़े।

<—-Part- 4                                           Part- 6 —->

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