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Hindi Story of Chanakya Part- 6 (स्टोरी ऑफ़ चाणक्य पार्ट- 6)

Posted on January 28, 2016February 13, 2016 by Pankaj Goyal

Hindi Story of Chanakya

Hindi Story of Chanakya Part- 6

लम्बे समय बाद हुई अपनों से भेंट

अपना संकल्प पूरा कर लेने के बाद चाणक्य अपनी झोपड़ी में लौट गए। उनके मन में पूर्ण शांति भर गई थी। उस दिन उन्होंने वर्षों बाद जी भरकर विश्राम किया। अब वे अपने बचपन की मित्र सुवासिनी और चाचा-चाची से मिलना चाहते थे। उन्हें क्या पता था की उनके माता-पिता की तरह उनकी चाची भी अब संसार में नहीं रही। किसानों से वे इतना जान चुके थे कि शकटार को न केवल बंदीगृह से रिहा कर दिया गया है, बल्कि उन्हें एक मंत्री पद भी दे दिया गया  है, परन्तु सुवासिनी या उसकी माँ के बारे में कुछ नही जान पाए थे। न ही उन्होंने  बारे में किसानो से कुरेद-कुरेदकर पूछना उचित समझा था।

वे महाराज की हत्या करके उनका सिर चौराहे पर टांग आए थे। अतः जब तक वहां का वातावरण शांत  जाए, वहां पुनः जाना उचित नहीं समझते थे, परन्तु सुवासिनी से मिलने व उसे देखने के लिए वे बहुत व्याकुल थे, काफी प्रयत्न करने पर, फिर एक दिन सुवासिनी व शकटार से उनकी भेंट हो ही गई।

चाणक्य तक्षशिला लौट आए

अपने प्रियजनों से भेंट करके आचार्य चाणक्य तक्षशिला पहुंच गए। विश्वविद्यालय के सभी कर्मचारी, ऋषि-महात्मा, आचार्यगण, कुलपति तथा कई राज्यों के राजकुमार उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। नया सत्र प्रारम्भ होने में केवल एक ही दिन शेष था और चाणक्य यह वचन देकर गए थे कि वह सत्र शुरू होने से पहले ही लौट आएंगे, इसलिए सभी को उनकी व्याकुलता से प्रतीक्षा थी।तक्षशिला में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जिसे यह अनुमान हो कि आचार्य विष्णुगुप्त का जन्म-स्थान कौन-सा है ? वे अवकाश लेकर कहां गए है तथा क्या कार्य सिद्ध करके लौटेंगे।

चाणक्य प्रायः कम बोलते थे, परन्तु इस बार वे लौटे तो लगभग मौनव्रती होकर ही लौटे। कोई कैसे जान सकता था कि उनके मन में कैसी हलचल हो रही है। कुछ कर दिखाने की कैसी उत्कृष्ट इच्छा जन्म ले चुकी है।

अगले ही दिन से उन्होंने अपना कार्यभार संभाल लिया तथा छात्रों को पूरी तन्मयता से शिक्षा देने लगे।

सिकंदर का आक्रमण

लगभग पंद्रह वर्ष तक चाणक्य दिन-रात अपने कार्य में लगे रहे। इस बीच सिकंदर लगातार भारतवर्ष में आगे बढ़ता रहा। कुछ राज्यों में आक्रमण करके उसने अपना अधिकार भी कर लिया। चाणक्य अब वृद्धावस्था में प्रवेश कर चुके थे। चाहा तो उन्होंने भी था कि उनका एक घर परिवार हो, परन्तु व्यक्तिगत हितो के लिए उन्होंने कभी अपनी भावनाओ का त्याग नहीं किया। वे लगातार राजकुमारों को देश-प्रेम की शिक्षा देते रहे तथा उन्हें विदेशी शक्तियों के विरुद्ध संगठित हो जाने का संदेश देते रहे।

इन पंद्रह वर्षो में चाणक्य पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध हो गए। प्रत्येक राज्य में उनका नाम सम्मानपूर्वक लिया जाने लगा। उनसे पढ़े हुए कई राजकुमार तो राजा भी बन गए।
एक दिन चाणक्य ने मगध जाने का विचार किया। वे अपने चाचा शकटार व अपनी मित्र सुवासिनी से मिलना चाहते थे। अपनी जन्मभूमि की राजनैतिक स्थिति जानना चाहते थे।

बालक  चन्द्रगुप्त से भेंट

एक दिन चाणक्य महल के पिछले भाग के निकट टहल रहे थे। राज्य की बदलती हुई स्थिति व खतरे की आशंका को वे अच्छी तरह से जान चुके थे। सुवासिनी का चेहरा अभी तक उन्हें दिखाई नहीं दिया था। एकाएक मार्ग की कंटीली घास उनके पैरों में चुभ गई तथा वहां से खून निकलने लगा। उन्हें क्रोध आ गया। उन्होंने उस मार्ग की सारी कंटीली घास को उखाड़ फेकने का निर्णय ले लिया। वे तन्मयता से अपने इस कार्य में जुट गए।

जब तक उन्होंने पूरी घास को उखड न लिया, अपने हाथो को नहीं रोका। अपना कार्य समाप्त करके वे एक वृक्ष के नीचे जा बैठे तथा विश्राम करने लगे।

“प्रणाम ब्राह्मण देवता।” तभी एक कोमल स्वर सुनाई दिया। उन्होंने देखा तो चकित रह गए। उनके सामने वही बालक खड़ा था, जिसने मदारी की चुनौती को स्वीकार किया था।

“तुम ?” चाणक्य चौंककर बोले___”तुम तो वही हो न जिसने उस मदारी की चुनौती को स्वीकार किया था ?”

“हां ब्राह्मण देवता।” बालक ने उत्तर दिया___”मैं वही हूं।”

“क्या तुम मौर्य हो ?” चाणक्य ने हिचकिचाते हुए पूछा।

” हां ! इस समय मैं ही एकमात्र जीवित मौर्य हूं। मेरे पिता व भाइयों की हत्या हो गई। केवल मैं  बच गया।”

“तुम्हे जीवित क्यों छोड़ दिया गया ?”

” क्या आप हमारे बारे में सब कुछ जानते है ?”

“मैं केवल इतना ही जानता हूं की तुम्हारे पिता व भाइयों ने जंगल में बने महल में भूख-प्यास से तड़प-तड़पकर दम तोड़ दिया।”

“जी हां, परन्तु मैं फिर भी जीवित रहा। कुछ दिनों बाद जब लाशों की दुर्गन्ध फैलने लगी तो  महल का द्वार खुलवाया गया। मुझे बाहर निकालकर महल को लाशों सहित आग लगा दी गई। महाराज व उसके भाई यह नहीं चाहते थे की मौर्यों की मौत की वास्तविकता कोई जान पाए। मुझे लाकर बंदीगृह में डाल दिया गया।”

“परन्तु तुम अपनी बुद्धिमानी से स्वतंत्र हो गए। क्या तुम्हे महल में कोई काम भी दे दिया गया है ?”

“जी हां ब्राह्मण देवता। मुझे अतिथिशाला का कार्य-भार सौंप दिया गया है। मैं अतिथियों को को भोजन खिलाता हूं तथा उनकी सेवा करता हूं।”

“परन्तु यह कार्य कुलीनों का नहीं है।”

“सेवा-कार्य मिल जाना मेरा सौभाग्य है।” बालक बोला___”मैं अतिथियों की सेवा करके आनंद का अनुभव करता हूं।”

चाणक्य की खोजपूर्ण दृष्टी बालक के चेहरे पर गड़-सी गई, परन्तु बालक उससे जरा भी विचलित न हुआ। उसने सम्मानपूर्वक कहा___”मैं आपसे यह प्रार्थना करने आया हूं कि चलकर अतिथिशाला में भोजन कर ले।”

“भोजन ?” चाणक्य चौंककर बोले___”तुम्हे कैसे पता की मुझे इस समय भोजन की आवश्यकता है ?”

“मैं सुबह से आपको देख रहा हूं।”बालक ने कहा___”आपने बिना रुके दोपहर तक लगातार कार्य किया है !आपने इस मार्ग की सारी कंटीली घास को उखाड़ फेका है। क्या आपको भूख नहीं लगी होगी। कृपया मेरे साथ चले और भोजन करके मुझे कृतार्थ करे।”

चाणक्य ने बालक को निकट बुलाया, फिर उसके सिर पर आशीर्वाद का हाथ रखकर पूछा___”तेरा नाम क्या है?”

“मेरा नाम चंद्रगुप्त है ब्राह्मण देवता।” बालक ने उत्तर दिया___”मैं अपने माता-पिता का सबसे छोटा पुत्र हूं।”

“परन्तु तेरा भाग्य बहुत ऊंचा है पुत्र।” चाणक्य ने कहा___”ईश्वर ने चाहा तो तू राजा बनेगा।”
“यदि आप जैसा कोई गुरु मिल गया तो अवश्य बन जाऊंगा।”
“मेरे जैसा गुरु।””आप धुन के पक्के है ब्राह्मण देवता। आप जो करने की ठान लेते है, उसे करके ही दम लेते है। यदि मैं राजा बनूंगा तो ऐसे ही गुरु की कृपा से बन पाऊंगा। अब आइये, आपको तेज भूख लगी होगी।” चाणक्य प्रसन्नतापूर्वक उठ खड़े हुए तथा चंद्रगुप्त के साथ चल पड़े।

<—– Part- 5                                                                                                       Part- 7——->

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