गज़ल
स्वाभिमान की गज़ल
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साया बनने से बेहतर तो धूप का ही मेहमान है,
लड़कर अकेले अपनी राह बनाना ही असली पहचान है।
1- भीड़ में जो बिखरने न दे, वो एक अदृश्य कवच है,
भीतर की गरिमा को जो बुझने न दे, वो दीया-ए-सम्मान है।
2-सत्य और मर्यादा की ख़ातिर गर तन्हा भी चलना पड़े,
विपरीत राहों पर अडिग रहना ही पहला सोपान है।
3- अपनी ही नज़रों में जो गिर गया, उसे वैभव क्या देगा इज़्ज़त,
संसार के हर सुख से बढ़कर तो अपनी आत्मा का ईमान है।
4- ज्ञानी और सुलझा हुआ पुरुष कभी करता नहीं अहंकार,
जो चरित्र से सौदा न करे “अजय”वही शख़्स सबसे महान है।
– आचार्य डॉ अजय दीक्षित

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