स्वाभिमान पर शायरी – आचार्य डॉ अजय दीक्षित
Shayari On Self-Respect
1
कद्र न मिले जहाँ, वहाँ कदम न बढ़ाना,
चाहे कोई महल हो या चाहत का ठिकाना।
झुकना पड़े गर बार-बार अस्तित्व मिटाकर,
तो “अजय” बेहतर है अपना स्वाभिमान बचाना।
2
मांगी हुई रोशनी से कब उजाला होता है,
चमकना है तो खुद सूरज-सा जलना होता है।
तपिश अपनी ऐसी रखो, ज़माना झुक जाए,
तब “अजय”देखे दुनिया कि असली सवेरा होता है।
3
झुक जाना कमजोरी की निशानी नहीं होता,
दरिया भी झुकता है, पर पानी नहीं होता।
पर जहाँ बात हो इज्जत की, खुद्दारी की,
वहाँ अड़ जाना “अजय” किरदार की रवानी होता।
4
खाली है दामन फिर भी नहीं हम हारे,
मेहनत से भर लेंगे ये खाली किनारे।
पर हाथ फैलाकर जो गरिमा खो दी “अजय”
उससे बड़ी दरिद्रता नहीं जग में सारे।
5
अपनी गरिमा को दूसरों की नजरों से बचाये,
पर ऊँचा वो नहीं जो औरों को नीचा दिखाए।
सच्चा स्वाभिमान “अजय”बस इतना है,
गिरने न दे खुद को, चाहे दुनिया गिर जाए।

डा. अजय दीक्षित जी द्वारा लिखे अन्य गीत –
- वतन रो रहा है
- दर्द की सच्चाई – आचार्य डॉ अजय दीक्षित “अजय”
- रोते-रोते मुस्कराना पडता है
- अपना देश हिंदुस्तान
- कलम लिखै तौ यहै लिखै
- रख्खो उम्मीद दिल के कोने में
- अजय दीक्षित शायरी
- शरीर का सार
Related posts:
