प्रेम के पंख
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नीले आकाश की नीरव गोद में,
दो आत्माएँ सिमटी खड़ी हैं,
जैसे समय भी थम-सा गया हो,
और हवाएँ भी धीमे चल पड़ी हैं।
सफेद पंखों की उस कोमल छाया में,छुपा है सारा संसार,
एक-दूजे में खोकर जैसे
मिल गया हो जीवन का सार।
न कोई शब्द, न कोई वचन,
फिर भी सब कुछ कह जाते हैं,
ये मौन स्पर्श के ये पल
प्रेम की गहराई बता जाते हैं।
उड़ते पंखों से गिरते ये पर,
जैसे आशीष बन बरस रहे हों,
हर कण में शांति, हर क्षण में स्नेह,
मानो स्वर्ग यहीं उतर रहे हों।
एक ने सर झुकाया धीरे से,
दूसरे ने उसे थाम लिया,
दुनिया की हर ठोकर से बचाकर
अपने पंखों में नाम लिया।
प्रेम न ऊँची आवाज़ माँगता है,
न बड़े दिखावे की राह,
बस एक सच्चा स्पर्श काफी है,
जो मिटा दे हर एक चाह।
ये दो पंछी नहीं, दो प्रार्थनाएँ हैं,
जो गगन तक जा रही “अजय”
हर दिल को सिखा रही हैं—
“प्रेम ही सबसे बड़ी साधना है।”

आचार्य डॉ अजय दीक्षित
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